भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1579

यदि कोई धनुषसे छूटे हुए बाणके समान अथवा मनके सदृश तीव्र वेगसे निरन्तर दौड़ता रहे तो भी जगत्‌के कारणस्वरूप उस परमेश्वरका अन्त नहीं पा सकता॥ २७½॥ तस्मात् सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं नास्ति स्थूलतरं ततः॥ २८॥ सर्वतःपाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्। सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ २९॥ उस सूक्ष्मस्वरूप परमात्मासे बढ़कर सूक्ष्मतर वस्तु कोई नहीं है, उससे बढ़कर स्थूलतर वस्तु भी कोई नहीं है। उसके सब ओर हाथ पैर हैं, सब ओर नेत्र, सिर और मुख हैं तथा सब ओर कान हैं। वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है॥ २८-२९॥ तदेवाणोरणुतरं तन्महद्भ्यो महत्तरम्। तदन्तःसर्वभूतानां ध्रुवं तिष्ठन्न दृश्यते॥ ३०॥ वह लघुसे भी अत्यन्त लघु और महान्‌से भी अत्यन्त महान् है, वह निश्चय ही समस्त प्राणियोंके भीतर स्थित है तो भी किसीको दिखायी नहीं देता॥ ३०॥ अक्षरं च क्षरं चैव द्वैधीभावोऽयमात्मनः। क्षरः सर्वेषु भूतेषु दिव्यं तमृतमक्षरम्॥ ३१॥ उस परमात्माके क्षर और अक्षर ये दो भाव (स्वरूप) हैं, सम्पूर्ण भूतोंमें तो उसका क्षर (विनाशी) रूप है और दिव्य सत्यस्वरूप चेतनात्मा अक्षर (अविनाशी) है॥ ३१॥ नवद्वारं पुरं गत्वा हंसो हि नियतो वशी। ईशः सर्वस्य भूतस्य स्थावरस्य चरस्य च॥ ३२॥ स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंका ईश्वर स्वाधीन परमात्मा नव द्वारोंवाले शरीरमें प्रवेश करके हंस (जीव) रूपसे स्थिरतापूर्वक स्थित है॥ ३२॥ हानिभङ्गविकल्पानां नवानां संचयेन च। शरीराणामजस्याहुर्हंसत्वं पारदर्शिनः॥ ३३॥ पारदर्शी (तत्त्वज्ञानी) पुरुष परिणाममें हानि, भंग एवं विकल्पसे युक्त नवीन शरीरोंको बारंबार ग्रहण करनेके कारण अजन्मा परमात्माके अंशभूत जीवात्माको 'हंस' कहते हैं॥ ३३॥ हंसोक्तं चाक्षरं चैव कूटस्थं यत् तदक्षरम्। तद् विद्वानक्षरं प्राप्य जहाति प्राणजन्मनी॥ ३४॥ हंस नामसे जिस अविनाशी जीवात्माका प्रतिपादन किया गया है, वह कूटस्थ अक्षर ही है, इस प्रकार जो विद्वान् उस अक्षर आत्माको यथार्थरूपसे जान लेता है, वह प्राण, जन्म और मृत्युके बन्धनको सदाके लिये त्याग देता है॥ ३४॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३९॥