महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1598, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुटुम्बमें भरण-पोषणके योग्य जितने लोग हैं, उनको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नको जो भोजन करता है, उसे विघसाशी (विघस अन्न भोजन करनेवाला) बताया गया है। पोष्यवर्गसे बचे हुए अन्नको विघस तथा पंचमहायज्ञ एवं बलिवैश्वदेवसे बचे हुए अन्नको अमृत कहते हैं ॥ १३ ॥
स्वदारनिरतो दान्तो ह्यनसूयुर्जितेन्द्रियः । ऋत्विक् पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः ॥ १४ ॥ वृद्धबालातुरैर्वैद्यैर्ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः । मातापितृभ्यां जामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया ॥ १५ ॥ दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् । एतान् विमुच्य संवादान् सर्वपापैर्विमुच्यते ॥ १६ ॥
गृहस्थ पुरुष सदा अपनी ही स्त्रीसे प्रेम करे। इन्द्रियोंका संयम करके जितेन्द्रिय बने। किसीके गुणोंमें दोष न ढूँढ़े। वह ऋत्विज्, पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, शरणागत, वृद्ध, बालक, रोगी, वैद्य, जाति-भाई, सम्बन्धी, बन्धु-बान्धव, माता-पिता, कुटुम्बकी स्त्री, भाई, पुत्र, पत्नी, पुत्री तथा सेवक-समूहके साथ कभी विवाद न करे। जो इन सबके साथ कलह त्याग देता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १४—१६ ॥
एतैर्जितस्तु जयति सर्वाँल्लोँकान् न संशयः । आचार्यो ब्रह्मलोकेशः प्राजापत्ये पिता प्रभुः ॥ १७ ॥ अतिथिस्त्विन्द्रलोकस्य देवलोकस्य चर्त्विजः । जामयोऽप्सरसां लोके वैश्वदेवे तु ज्ञातयः ॥ १८ ॥
इनसे हार मानकर रहनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण लोकोंपर विजय पाता है, इसमें संशय नहीं है। आचार्य ब्रह्मलोकका स्वामी है, पिता प्रजापतिलोकका ईश्वर है, अतिथि इन्द्रलोकके और ऋत्विज् देवलोकके स्वामी हैं। कुटुम्बकी स्त्रियाँ अप्सराओंके लोककी स्वामिनी हैं और जाति-भाई विश्वेदेव लोकके अधिकारी हैं ॥ १७-१८ ॥
सम्बन्धिबान्धवा दिक्षु पृथिव्यां मातृमातुलौ । वृद्धबालातुरकृशास्त्वाकाशे प्रभविष्णवः ॥ १९ ॥
सम्बन्धी और बन्धु-बान्धव दिशाओंपर, माता और मामा पृथ्वीपर तथा वृद्ध, बालक और निर्बल रोगी आकाशपर अपना प्रभुत्व रखते हैं। इन सबको संतुष्ट रखनेसे उन-उन लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ १९ ॥
भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः । छाया स्वा दासवर्गश्च दुहिता कृपणं परम् ॥ २० ॥
बड़ा भाई पिताके समान है। पत्नी और पुत्र अपने ही शरीर हैं तथा सेवकगण अपनी छायाके समान हैं। बेटी तो और भी अधिक दयनीय है ॥ २० ॥
तस्मादेतैरधिक्षिप्तः सहेन्नित्यमसंज्वरः ।