भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1629, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1629

परमात्मस्वरूपमें स्थित हो जाय ॥ ६ ॥ ताम्येयुः प्रच्युताः पृथ्व्या यथा पूर्णां नदीं नराः । अवगाढा ह्यविद्वांसो विद्धि लोकमिमं तथा ॥ ७ ॥ जैसे तैरनेकी कला न जाननेवाले मनुष्य यदि किनारेकी भूमिसे जलपूर्ण नदीमें गिर पड़ते हैं तो गोते खाते हुए महान् क्लेश सहन करते हैं; उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य इस संसार-सागरमें डूबकर कष्ट भोगते रहते हैं—ऐसा समझो ॥ ७ ॥ न तु ताम्यति वै विद्वान् स्थले चरति तत्त्ववित् । एवं यो विन्दतेऽऽत्मानं केवलं ज्ञानमात्मनः ॥ ८ ॥ परंतु जो तैरना जानता है, वह कष्ट नहीं उठाता। वह तो जलमें भी स्थलकी ही भाँति चलता है, उसी तरह ज्ञानस्वरूप विशुद्ध आत्माको प्राप्त हुआ तत्त्ववेत्ता संसार-सागरसे पार हो जाता है ॥ ८ ॥ एवं बुद्ध्वा नरः सर्वं भूतानामागतिं गतिम् । समवेक्ष्य च वैषम्यं लभते शममुत्तमम् ॥ ९ ॥ जो मनुष्य इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणियोंके आवागमनको जानता तथा उनकी विषम अवस्थापर विचार करता है, उसे परम उत्तम शान्ति प्राप्त होती है ॥ ९ ॥ एतद् वै जन्मसामर्थ्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः । आत्मज्ञानं शमश्चैव पर्याप्तं तत्परायणम् ॥ १० ॥ विशेषरूपसे ब्राह्मणमें और समानभावसे मनुष्यमात्रमें इस ज्ञानको प्राप्त करनेकी जन्मसिद्ध शक्ति है। मन और इन्द्रियोंका संयम तथा आत्मज्ञान मोक्ष-प्राप्तिके लिये पर्याप्त साधन है ॥ १० ॥ एतद् बुद्ध्वा भवेत् शुद्धः किमन्यद् बुद्धलक्षणम् । विज्ञायैतद् विमुच्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ॥ ११ ॥ शम और आत्मतत्त्वको जानकर पुरुष अत्यन्त शुद्ध-बुद्ध हो जाता है। ज्ञानीका इसके सिवा और क्या लक्षण हो सकता है। बुद्धिमान् मनुष्य इस आत्मतत्त्वको जानकर कृतार्थ और मुक्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥ न भवति विदुषां महद्भयं यदविदुषां सुमहद्भयं परत्र । न हि गतिरधिकास्ति कस्यचिद् भवति हि या विदुषः सनातनी ॥ १२ ॥ परलोकमें जो अज्ञानी मनुष्योंको महान् भय प्राप्त होता है, यह महान् भय ज्ञानी पुरुषोंको नहीं होता। ज्ञानीको जो सनातन गति प्राप्त होती है, उससे बढ़कर उत्तम गति और किसीको भी प्राप्त नहीं होती ॥ १२ ॥ लोकमातुरमसूयते जन-