महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1634, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंनैव स्त्री न पुमानेतन्नैव चेदं नपुंसकम् । अदुःखमसुखं ब्रह्म भूतभव्यभवात्मकम् ॥ २२ ॥ दुःख और सुखसे रहित तथा भूत, भविष्य एवं वर्तमानस्वरूप ब्रह्म तो न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है ॥ २२ ॥
नैतज्ज्ञात्वा पुमान् स्त्री वा पुनर्भवमवाप्नुते । अभवप्रतिपत्त्यर्थमेतद् धर्मं विधीयते ॥ २३ ॥ पुरुष हो या स्त्री, इस ब्रह्मको जान ले तो उसका पुनः इस संसारमें जन्म नहीं होता। अपुनर्भवस्थिति प्राप्त करनेके लिये ही इस ब्रह्मज्ञानरूप धर्मका विधान किया गया है ॥ २३ ॥
यथा मतानि सर्वाणि तथैतानि यथा तथा । कथितानि मया पुत्र भवन्ति न भवन्ति च ॥ २४ ॥ बेटा! सारे विभिन्न मत जैसे रहे हैं, वैसे ही मेरेद्वारा तुम्हारे समक्ष यथार्थरूपसे बताये गये हैं। जो इन मतोंका अनुसरण करते हैं; वे मुक्त हो जाते हैं, जो नहीं करते हैं, वे नहीं होते ॥ २४ ॥
तत् प्रीतियुक्तेन गुणान्वितेन पुत्रेण सत्पुत्र दमान्वितेन । पृष्टो हि सम्प्रीतमना यथार्थं ब्रूयात् सुतस्येह यदुक्तमेतत् ॥ २५ ॥ सत्पुत्र शुकदेव! प्रीतियुक्त, गुणवान् तथा इन्द्रियसंयमी पुत्र यदि प्रश्न करे तो पिता संतुष्टचित्त होकर उस जिज्ञासु पुत्रके समीप यथार्थरूपसे इस ज्ञानका उपदेश करे, जो कुछ मैंने तुम्हारे निकट कहा है ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५० ॥