महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1644, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोकर लाँघ जाते हैं ॥ १३ ॥ पृथग्भूतेषु सृष्टेषु चतुर्थाश्रमकर्मसु । समाधौ योगमेवैतच्छाण्डिल्यः शममब्रवीत् ॥ १४ ॥ संन्यास आश्रमके कर्म भिन्न-भिन्न प्रकारके बताये गये हैं। उनमें समाधिके विषयमें मैंने जो कुछ बताया है, इसीको शाण्डिल्य मुनिने शमके नामसे (छान्दोग्योपनिषद् शाण्डिल्य ब्राह्मणमें) कहा है ॥ १४ ॥ विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम् । प्रधानविनियोगज्ञः परं ब्रह्मानुपश्यति ॥ १५ ॥ जो पञ्चतन्मात्रा तथा मन और बुद्धि—इन सात सूक्ष्म तत्त्वोंको शाश्वत जानकर एवं छः अंगोंसे यानी ऐश्वर्योंसे युक्त महेश्वरका ज्ञान प्राप्त करके इस बातको जान लेता है कि त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका परिणाम ही यह सम्पूर्ण जगत् है, वह परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५३ ॥