महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहादेवजीने कहा— देवेश्वर! संहारके लिये आप क्रोध न करें। प्रजापर प्रसन्न हों। कहीं ऐसा न हो कि समस्त चराचर प्राणियोंका विनाश हो जाय ।। ६ ।।
पल्वलानि च सर्वाणि सर्वं चैव तृणोपलम् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव भूतग्रामं चतुर्विधम् ।। ७ ।।
तदेतद् भस्मसाद्भूतं जगत् सर्वमुपप्लुतम् ।
प्रसीद भगवन् साधो वर एष वृतो मया ।। ८ ।।
ये सारे जलाशय, सब-के-सब घास और लता-बेलें तथा चार प्रकारके प्राणिसमुदाय (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) भस्मीभूत हो रहे हैं। सारे जगत्का प्रलय उपस्थित हो गया है। भगवन्! प्रसन्न होइये। साधो! मैं आपसे यही वर माँगता हूँ ।। ७-८ ।।
नष्टा न पुनरेष्यन्ति प्रजा ह्येताः कथंचन ।
तस्मान्निवर्ततामेतत् तेन स्वेनैव तेजसा ।। ९ ।।
यदि इन प्रजाओंका नाश हो गया तो ये किसी तरह फिर यहाँ उपस्थित न हो सकेंगी। इसलिये आप अपने ही प्रभावसे इस क्रोधाग्निको निवृत्त कीजिये ।। ९ ।।
उपायमन्यं सम्पश्य भूतानां हितकाम्यया ।
यथामी जन्तवः सर्वे न दह्येरन् पितामह ।। १० ।।
पितामह! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके हितके लिये संहारका कोई दूसरा ही उपाय सोचिये, जिससे ये सारे जीव-जन्तु एक साथ ही दग्ध न हो जायें ।। १० ।।
अभावं हि न गच्छेयुरुच्छिन्नप्रजनाः प्रजाः ।
अधिदैवे नियुक्तोऽस्मि त्वया लोकेश्वरेश्वर ।। ११ ।।
लोकेश्वरेश्वर! आपने मुझे देवताओंके आधिपत्य-पदपर नियुक्त किया है, अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, यदि प्रजाकी संततिका उच्छेद होगा तो समस्त प्रजाओंका सर्वथा अभाव ही हो जायगा; अतः आप इस विनाशको बंद कीजिये ।। ११ ।।
त्वद्भवं हि जगन्नाथ एतत् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रसाद्य त्वां महादेव याचाम्यावृत्तिजाः प्रजाः ।। १२ ।।
जगन्नाथ! महादेव! यह समस्त चराचर जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है; अतः मैं आपको प्रसन्न करके यह याचना करता हूँ कि ये सारी प्रजा पुनरावर्तनशील हो—मरकर पुनः जन्म धारण करे ।। १२ ।।
नारद उवाच
श्रुत्वा तु वचनं देवः स्थाणोर्नियतवाङ्मनाः ।
तेजस्तत् संनिजग्राह पुनरेवान्तरात्मनि ।। १३ ।।
नारदजी कहते हैं— राजन्! महादेवजीकी वह बात सुनकर भगवान् ब्रह्माने मन और वाणीका संयम किया तथा उस अग्निको पुनः अपनी अन्तरात्मामें ही लीन कर