महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1661, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोकनाथ ब्रह्माजी स्वयं ही अपने मनमें बड़े प्रसन्न हुए और मुसकराते हुए समस्त लोकोंकी ओर देखने लगे॥ निवृत्तरोषे तस्मिंस्तु भगवत्यपराजिते। सा कन्याथ जगामास्य समीपादिति नः श्रुतम् ॥ १४ ॥ उन अपराजित भगवान् ब्रह्माका रोष निवृत्त हो जानेपर वह कन्या भी उनके निकटसे चली गयी, ऐसा हमने सुना है॥ १४॥ अपसृत्याप्रतिश्रुत्य प्रजासंहरणं तदा। त्वरमाणेव राजेन्द्र मृत्युर्धेनुकमभ्यगात् ॥ १५ ॥ राजेन्द्र! उस समय प्रजाका संहार करनेके विषयमें कोई प्रतिज्ञा न करके मृत्यु वहाँसे हट गयी और बड़ी उतावलीके साथ धेनुकाश्रममें जा पहुँची॥ १५॥ सा तत्र परमं देवी तपोऽचरद् दुष्करम्। समा ह्येकपदे तस्थौ दश पद्मानि पञ्च च ॥ १६ ॥ वहाँ मृत्युदेवीने अत्यन्त दुष्कर और उत्तम तपस्या की। वह पंद्रह पद्म वर्षोंतक एक पैरपर खड़ी रही॥ तां तथा कुर्वतीं तत्र तपः परमदुष्करम्। पुनरेव महातेजा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥ इस प्रकार वहाँ अत्यन्त दुष्कर तपस्या करती हुई मृत्युसे महातेजस्वी ब्रह्माजीने पुनः जाकर इस प्रकार कहा—॥ कुरुष्व मे वचो मृत्यो तदनादृत्य सत्वरा। तथैकपदे तात पुनरन्यानि सप्त सा ॥ १८ ॥ तस्थौ पद्मानि षट् चैव पञ्च द्वे चैव मानद। ‘मृत्यो! तुम मेरी आज्ञाका पालन करो।’ दूसरोंको मान देनेवाले तात! उनके इस कथनका आदर न करके मृत्युने तुरंत ही दूसरे बीस पद्म वर्षोंतक पुनः एक पैरपर खड़ी हो तपस्या आरम्भ कर दी ॥ १८ १/२ ॥ भूयः पद्मायुतं तात मृगैः सह चचार सा ॥ १९ ॥ द्वे चायुते नरश्रेष्ठ वाय्वाहारा महामते। तात! महामते! नरश्रेष्ठ! फिर वह दस हजार पद्म वर्षोंतक मृगोंके साथ विचरती रही। इसके बाद बीस हजार वर्षोंतक उसने केवल वायुका आहार किया॥ १९ १/२ ॥ पुनरेव ततो राजन् मौनमातिष्ठदुत्तमम् ॥ २० ॥ अप्सु वर्षसहस्राणि सप्त चैकं च पार्थिव। राजन्! तदनन्तर उसने उत्तम मौन-व्रत धारण कर लिया। पृथ्वीपते! फिर उसने जलमें आठ हजार वर्षोंतक रहकर तपस्या की॥ २० १/२ ॥ ततो जगाम सा कन्या कौशिकीं नृपसत्तम ॥ २१ ॥