भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1669, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1669

अतिशय सुखी ही हुआ करते हैं (अतः धनका अभिमान नहीं करना चाहिये) ।। १९ ।। यदन्यैर्विहितं नेच्छेदात्मनः कर्म पूरुषः । न तत् परेषु कुर्वीत जानन्नप्रियमात्मनः ।। २० ।। मनुष्य दूसरोंद्वारा किये हुए जिस व्यवहारको अपने लिये वांछनीय नहीं मानता, दूसरोंके प्रति भी वह वैसा बर्ताव न करे। उसे यह जानना चाहिये कि जो बर्ताव अपने लिये अप्रिय है, वह दूसरोंके लिये भी प्रिय नहीं हो सकता ।। २० ।। योऽन्यस्य स्यादुपपतिः स कं किं वक्तुमर्हति । यदन्यस्य ततः कुर्यान्न मृष्येदिति मे मतिः ।। २१ ।। जो स्वयं दूसरेके घरमें उपपति (जार) बनकर जाता है—परायी स्त्रीके साथ व्यभिचार करता है, वह दूसरेको वैसा ही कर्म करते देख किससे क्या कह सकता है? यदि दूसरेकी उसी प्रवृत्तिके कारण वह निन्दा करे तो वह पुरुष उसकी निन्दाको नहीं सह सकता—ऐसा मेरा विश्वास है ।। २१ ।। जीवितुं यः स्वयं चेच्छेत् कथं सोऽन्यं प्रघातयेत् । यद् यदात्मनि चेच्छेत तत् परस्यापि चिन्तयेत् ।। २२ ।। जो स्वयं जीवित रहना चाहता हो, वह दूसरोंके प्राण कैसे ले सकता है? मनुष्य अपने लिये जो-जो सुख-सुविधा चाहे, वही दूसरेके लिये भी सुलभ करानेकी बात सोचे ।। २२ ।। अतिरिक्तैः संविभजेद् भोगैरन्यानकिंचनान् । एतस्मात् कारणाद् धात्रा कुसीदं सम्प्रवर्तितम् ।। २३ ।। जो अपनी आवश्यकतासे अधिक हो, उन भोगपदार्थोंको दूसरे दीन-दुखियोंके लिये बाँट दे। इसीलिये विधाताने सूदपर धन देनेकी वृत्ति चलायी है ।। यस्मिंस्तु देवाः समये संतिष्ठेरंस्तथा भवेत् । अथवा लाभसमये स्थितिर्धर्मेऽपि शोभना ।। २४ ।। जिस सन्मार्ग या मर्यादापर देवता स्थित होते हैं, उसीपर मनुष्यको भी स्थिर रहना चाहिये अथवा धन-लाभके समय धर्ममें स्थित रहना भी अच्छा है ।। २४ ।। सर्वं प्रियाभ्युपगतं धर्ममाहुर्मनीषिणः । पश्यैतं लक्षणोद्देशं धर्माधर्मे युधिष्ठिर ।। २५ ।। युधिष्ठिर! सबके साथ प्रेमपूर्ण बर्ताव करनेसे जो कुछ प्राप्त होता है, वह सब धर्म है, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है तथा जो इसके विपरीत है, वह अधर्म है। तुम धर्म और अधर्मका संक्षेपसे यही लक्षण समझो ।। २५ ।। लोकसंग्रहसंयुक्तं विधात्रा विहितं पुरा । सूक्ष्मधर्मार्थनियतं सतां चरितमुत्तमम् ।। २६ ।। विधाताने पूर्वकालमें सत्पुरुषोंके जिस उत्तम आचरणका विधान किया है, वह विश्वके कल्याणकी भावनासे युक्त है और उससे धर्म एवं अर्थके सूक्ष्म स्वरूपका ज्ञान होता