महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1676, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस चराचर जगत्में मेरे सिवा ऐसा कोई दूसरा मनुष्य नहीं है, जो मेरे साथ जलमें विचरने और आकाशमें घूमने-फिरनेकी शक्ति रखता हो ॥ ६ ॥ अदृश्यमानो रक्षोभिर्जलमध्ये वदंस्तथा । अब्रुवंश्च पिशाचास्तं नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ७ ॥ राक्षसोंसे अदृश्य रहकर जलयुक्त प्रदेशमें निवास करनेवाले जाजलि मुनिने जब इस प्रकार कहा, तब अदृश्य पिशाचोंने उनसे कहा, 'मुने! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ७ ॥ तुलाधारो वणिग्धर्मा वाराणस्यां महायशाः । सोऽप्येवं नार्हते वक्तुं यथा त्वं द्विजसत्तम ॥ ८ ॥ 'द्विजश्रेष्ठ! काशीमें महायशस्वी तुलाधार रहते हैं, जो वणिक्-धर्मका पालन करते हैं; किंतु वे भी ऐसी बात नहीं कह सकते, जैसी आज आप कह रहे हैं' ॥ ८ ॥ इत्युक्तो जाजलिर्भूतैः प्रत्युवाच महातपाः । पश्येयं तमहं प्राज्ञं तुलाधारं यशस्विनम् ॥ ९ ॥ उन अदृश्य भूतोंके ऐसा कहनेपर महातपस्वी जाजलिने उनसे कहा—'क्या मैं उन ज्ञानी एवं यशस्वी तुलाधारका दर्शन कर सकता हूँ' ॥ ९ ॥ इति ब्रुवाणं तमृषिं रक्षांस्युद्धृत्य सागरात् । अब्रुवन् गच्छ पन्थानमास्थायेमं द्विजोत्तम ॥ १० ॥ ऐसा कहते हुए उन महर्षिको समुद्रतटवर्ती जलप्रदेशसे बाहर निकालकर राक्षसोंने उनसे कहा—'द्विजश्रेष्ठ! इस मार्गका आश्रय लेकर काशीपुरी चले जाइये' ॥ १० ॥ इत्युक्तो जाजलिर्भूतैर्जगाम विमनास्तदा । वाराणस्यां तुलाधारं समासाद्याब्रवीदिदम् ॥ ११ ॥ उन अदृश्य भूतोंके ऐसा कहनेपर जाजलि मुनि उदास होकर काशीमें गये और तुलाधारके पास पहुँचकर उससे इस प्रकार बोले ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच किं कृतं दुष्करं तात कर्म जाजलिना पुरा । येन सिद्धिं परां प्राप्तस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १२ ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**तात! पूर्वकालमें जाजलिने कौन-सा ऐसा दुष्कर कार्य किया था, जिससे वे परम सिद्धिको प्राप्त हो गये, यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ १२ ॥
भीष्म उवाच अतीव तपसा युक्तो घोरेण स बभूव ह । तथोपस्पर्शनरतः सायं प्रातर्महातपाः ॥ १३ ॥ अग्नीन् परिचरन् सम्यक् स्वाध्यायपरमो द्विजः ।