महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1678, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंलिया ।। २० ।।
स तौ दयावान् ब्रह्मर्षिरुपप्रैक्षत दम्पती ।
कुर्वाणौ नीडकं तत्र जटासु तृणतन्तुभिः ॥ २१ ॥
वे विप्रर्षि बड़े दयालु थे, इसलिये उन्होंने उन दोनों पक्षियोंको तिनकोंसे अपनी जटाओंमें घोंसला बनाते देखकर भी उनकी उपेक्षा कर दी—उन्हें हटाने या उड़ानेकी कोई चेष्टा नहीं की ।। २१ ।।
यदा न स चलत्येव स्थाणुभूतो महातपाः ।
ततस्तौ सुखविश्वस्तौ सुखं तत्रोषतुस्तदा ॥ २२ ॥
जब वे महातपस्वी ठूँठे काठके समान होकर जरा भी हिले-डुले नहीं, तब अच्छी तरह विश्वास जम जानेके कारण वे दोनों पक्षी वहाँ बड़े सुखसे रहने लगे ।। २२ ।।
अतीतास्वथ वर्षासु शरत्काल उपस्थिते ।
प्राजापत्येन विधिना विश्वासात् काममोहितौ ॥ २३ ॥
तत्रापातयतां राजन् शिरस्यण्डानि खेचरौ ।
तान्यबुध्यत तेजस्वी स विप्रः संशितव्रतः ॥ २४ ॥
राजन्! धीरे-धीरे वर्षा-ऋतु बीत गयी और शरत्काल उपस्थित हुआ। उस समय कामसे मोहित होकर उन गौरैयोंने संतानोत्पादनकी विधिसे परस्पर समागम किया और विश्वासके कारण महर्षिके सिरपर ही अण्डे दिये। कठोर व्रतका पालन करनेवाले उन तेजस्वी ब्राह्मणको यह मालूम हो गया कि पक्षियोंने मेरी जटाओंमें अण्डे दिये हैं ।। २३-२४ ।।
बुद्ध्वा च स महातेजा न चचाल च जाजलिः ।
धर्मे कृतमना नित्यं नाधर्मं स त्वरोचयत् ॥ २५ ॥
इस बातको जानकर भी महातेजस्वी जाजलि विचलित नहीं हुए। उनका मन सदा धर्ममें लगा रहता था; अतः उन्हें अधर्मका कार्य पसंद नहीं था ।। २५ ।।
अहन्यहनि चागत्य ततस्तौ तस्य मूर्धनि ।
आश्वासितौ निवसतः सम्प्रहृष्टौ तदा विभो ॥ २६ ॥
प्रभो! चिड़ियोंके वे जोड़े प्रतिदिन चारा चुगनेके लिये जाते और फिर लौटकर उनके मस्तकपर ही बसेरा लेते थे, वहाँ उन्हें बड़ा आश्वासन मिलता था और वे बहुत प्रसन्न रहते थे ।। २६ ।।
अण्डेभ्यस्त्वथ पुष्टेभ्यः प्राजायन्त शकुन्तकाः ।
व्यवर्धन्त च तत्रैव न चाकम्पत जाजलिः ॥ २७ ॥
अण्डोंके पुष्ट होनेपर उन्हें फोड़कर बच्चे बाहर निकले और वहीं पलकर बड़े होने लगे, तथापि जाजलि मुनि हिले-डुले नहीं ।। २७ ।।