महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1681, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकभी-कभी वे विहंगम उड़कर पाँच-पाँच दिनतक बाहर ही रह जाते और छठे दिन वहाँ लौटते थे, तबतक भी जाजलि मुनि हिले-डुले नहीं ॥ ३५ ॥ क्रमेण च पुनः सर्वे दिवसान् सुबहूनथ । नोपावर्तन्त शकुना जातप्राणाः स्म ते यदा ॥ ३६ ॥ फिर क्रमशः वे सब पक्षी बहुत दिनोंके लिये जाने और आने लगे, अब वे हृष्ट-पुष्ट और बलवान् हो गये थे। अतः बाहर निकल जानेपर जल्दी नहीं लौटते थे ॥ कदाचिन्मासमात्रेण समुत्पत्य विहङ्गमाः । नैवागच्छंस्ततो राजन् प्रातिष्ठत स जाजलिः ॥ ३७ ॥ राजन्! एक समय वे आकाशचारी पक्षी उड़ जानेके बाद एक मासतक लौटकर नहीं आये, तब जाजलि मुनि वहाँसे अन्यत्र चल दिये ॥ ३७ ॥ ततस्तेषु प्रलीनेषु जाजलिर्जातविस्मयः । सिद्धोऽस्मीति मतिं चक्रे ततस्तं मान आविशत् ॥ ३८ ॥ उन पक्षियोंके अदृश्य हो जानेपर जाजलिको बड़ा विस्मय हुआ, वे मन-ही मन यह मानने लगे कि मैं सिद्ध हो गया, फिर तो उनके भीतर अहंकार आ गया ॥ ३८ ॥ स तथा निर्गतान् दृष्ट्वा शकुन्तान् नियतव्रतः । सम्भावितात्मा सम्भाव्य भृशं प्रीतमनाऽभवत् ॥ ३९ ॥ नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले वे सम्भावितात्मा महर्षि उन पक्षियोंको इस प्रकार गया हुआ देख अपनी सिद्धिकी सम्भावना करके मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३९ ॥ स नद्यां समुपस्पृश्य तर्पयित्वा हुताशनम् । उदयन्तमथादित्यमुपातिष्ठन्महातपाः ॥ ४० ॥ फिर नदीके तटपर जाकर उन महातपस्वी मुनिने स्नान किया और संध्या-तर्पणके पश्चात् अग्निहोत्रके द्वारा अग्निदेवको तृप्त करके उगते हुए सूर्यका उपस्थान किया ॥ ४० ॥ सम्भाव्य चटकान् मूर्ध्नि जाजलिर्जपतां वरः । आस्फोटयत् तथाऽऽकाशे धर्मः प्राप्तो मयेति वै ॥ ४१ ॥ जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ जाजलि अपने मस्तकपर चिड़ियोंके पैदा होने और बढ़ने आदिकी बातें याद करके अपनेको महान् धर्मात्मा समझने लगे और आकाशमें मानो ताल ठोंकते हुए स्पष्ट वाणीमें बोले, मैंने धर्मको प्राप्त कर लिया ॥ ४१ ॥ अथान्तरिक्षे वागासीत् तां च शुश्राव जाजलिः । धर्मेण न समस्त्वं वै तुलाधारस्य जाजले ॥ ४२ ॥ वाराणस्यां महाप्राज्ञस्तुलाधारः प्रतिष्ठितः । सोऽप्येवं नार्हते वक्तुं यथा त्वं भाषसे द्विज ॥ ४३ ॥