भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1685

या वृत्तिः स परो धर्मस्तेन जीवामि जाजले ॥ ६ ॥
जिसमें किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करना पड़े अथवा कम-से-कम द्रोह करनेसे काम चल जाय, ऐसी जो जीवन-वृत्ति है, वही उत्तम धर्म है। जाजले! मैं उसीसे जीवन निर्वाह करता हूँ ॥ ६ ॥

परच्छिन्नैः काष्ठतृणैर्मयेदं शरणं कृतम् ।
अलक्तं पद्मकं तुङ्गं गन्धांश्चोच्चावचांस्तथा ॥ ७ ॥

मैंने दूसरोंके द्वारा काटे गये काठ और घास-फूससे यह घर तैयार किया है। अलक्तक (वृक्षविशेषकी छाल), पद्मक (पद्माख), तुंगकाष्ठ तथा चन्दनादि गन्धद्रव्य एवं अन्य छोटी-बड़ी वस्तुओंको मैं दूसरोंसे खरीदकर बेचता हूँ ॥ ७ ॥

रसांश्च तांस्तान् विप्रर्षे मद्यवर्ज्यान् बहूनहम् ।
क्रीत्वा वै प्रतिविक्रीणे परहस्तादमायया ॥ ८ ॥

विप्रर्षे! मेरे यहाँ मदिरा नहीं बेची जाती, उसे छोड़कर बहुत-से पीनेयोग्य रसोंको दूसरोंसे खरीदकर बेचता हूँ। माल बेचनेमें छल-कपट एवं असत्यसे काम नहीं लेता ॥ ८ ॥

सर्वेषां यः सुहृन्नित्यं सर्वेषां च हिते रतः ।
कर्मणा मनसा वाचा स धर्मं वेद जाजले ॥ ९ ॥

जाजले! जो सब जीवोंका सुहृद् होता और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा सदा सबके हितमें लगा रहता है, वही वास्तवमें धर्मको जानता है ॥ ९ ॥

नानुरुद्ध्ये निरुद्ध्ये वा न द्वेष्मि न च कामये ।
समोऽहं सर्वभूतेषु पश्य मे जाजले व्रतम् ।
तुला मे सर्वभूतेषु समा तिष्ठति जाजले ॥ १० ॥

मैं न किसीसे अनुरोध करता हूँ न विरोध ही करता हूँ और न कहीं मेरा द्वेष है, न किसीसे कुछ कामना करता हूँ। समस्त प्राणियोंके प्रति मेरा समभाव है। जाजले! यही मेरा व्रत और नियम है, इसपर दृष्टिपात करो। मुने! मेरी तराजू सब मनुष्योंके लिये सम है—सबके लिये बराबर तौलती है ॥ १० ॥

नाहं परेषां कृत्यानि प्रशंसामि न गर्हये ।
आकाशस्येव विप्रेन्द्र पश्यँल्लोकस्य चित्रताम् ॥ ११ ॥

विप्रवर! मैं आकाशकी भाँति असंग रहकर जगत्के कार्योंकी विचित्रताको देखता हुआ दूसरोंके कार्योंकी न तो प्रशंसा करता हूँ और न निन्दा ही ॥ ११ ॥

इति मां त्वं विजानीहि सर्वलोकस्य जाजले ।
समं मतिमतां श्रेष्ठ समलोष्टाश्मकाञ्चनम् ॥ १२ ॥

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ जाजले! इस प्रकार तुम मुझे सब लोगोंके प्रति समता रखनेवाला और मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा सुवर्णको समान समझनेवाला जानो ॥ १२ ॥

यथान्धबधिरोन्मत्ता उच्छ्वासपरमाः सदा ।