महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1687, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरता हूँ॥ १९॥
प्रणष्टः शाश्वतो धर्मस्त्वनाचारेण मोहितः।
तेन वैद्यस्तपस्वी वा बलवान् वा विमुह्यते ॥ २० ॥
अनाचारसे सनातन धर्म मोहयुक्त होकर नष्ट हो जाता है। उसके द्वारा विद्वान्, तपस्वी तथा काम-क्रोधको जीतनेवाला बलवान् पुरुष भी मोहमें पड़ जाता है॥
आचाराज्जाजले प्राज्ञः क्षिप्रं धर्ममवाप्नुयात्।
एवं यः साधुभिर्दान्तश्चरेदद्रोहचेतसा ॥ २१ ॥
जाजले! जो जितेन्द्रिय पुरुष अपने चित्तमें दूसरोंके प्रति द्रोह न रखकर, इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा पालित आचारको अपने आचरणमें लाता है, वह विद्वान् वेदबोधित सदाचारका पालन करनेसे शीघ्र ही धर्मके रहस्यको जान लेता है॥ २१॥
नद्यां चेह यथा काष्ठमुह्यमानं यदृच्छया।
यदृच्छयैव काष्ठेन सन्धिं गच्छेत केनचित् ॥ २२ ॥
तत्रापराणि दारूणि संसृज्यन्ते परस्परम्।
तृणकाष्ठकरीषाणि कदाचिन्न समीक्षया ॥ २३ ॥
जैसे यहाँ नदीकी धारामें दैवेच्छासे बहता हुआ काठ अकस्मात् किसी दूसरे काठसे संयुक्त हो जाता है; फिर वहाँ दूसरे-दूसरे काष्ठ, तिनके, छोटी-छोटी लकड़ियाँ और सूखे गोबर भी आकर एक-दूसरेसे जुड़ जाते हैं, परंतु इन सबका वह संयोग आकस्मिक ही होता है, समझ-बूझकर नहीं (इसी प्रकार संसारके प्राणियोंके भी परस्पर संयोग-वियोग होते रहते हैं)॥
यस्मान्नोद्विजते भूतं जातु किंचित् कथंचन।
अभयं सर्वभूतेभ्यः स प्राप्नोति सदा मुने ॥ २४ ॥
मुने! जिससे कोई भी प्राणी कभी किसी तरह भी उद्विग्न नहीं होता, वह सदा सम्पूर्ण भूतोंसे अभय प्राप्त कर लेता है॥ २४॥
यस्मादुद्विजते विद्वन् सर्वलोको वृकादिव।
क्रोशत्तस्तीरमासाद्य यथा सर्वे जलेचराः ॥ २५ ॥
स भयं सर्वभूतेभ्यः सम्प्राप्नोति महामते।
महामते! विद्वन्! जैसे नदीके तीरपर आकर कोलाहल करनेवाले मनुष्यके डरसे सभी जलचर जन्तु भयके मारे छिप जाते हैं तथा जिस प्रकार भेड़ियेको देखकर सभी थर्रा उठते हैं, उसी प्रकार जिससे सब लोग डरते हैं, उसे भी सम्पूर्ण प्राणियोंसे भय प्राप्त होता है॥ २५ १/२ ॥
एवमेवायमाचारः प्रादुर्भूतो यतस्ततः।
सहायवान् द्रव्यवान् यः सुभगोऽथपरस्तथा ॥ २६ ॥