महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1694, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेदवादानविज्ञाय सत्याभासमिवानृतम् ॥ ६ ॥ ब्रह्मन्! धन कमानेके प्रयत्नमें लगे हुए बहुत-से लोभी और नास्तिक पुरुषोंने वैदिक वचनोंका तात्पर्य न समझकर सत्य-से प्रतीत होनेवाले मिथ्या यज्ञोंका प्रचार कर दिया है ॥ ६ ॥
इदं देयमिदं देयमिति चायं प्रशस्यते । अतः स्तैन्यं प्रभवति विकर्माणि च जाजले ॥ ७ ॥ जाजले! श्रुतियों और स्मृतियोंमें कहा गया है कि अमुक कर्मके लिये यह दक्षिणा देनी चाहिये, वह दक्षिणा देनी चाहिये, उसके अनुसार वैसी दक्षिणा देनेसे भी यह यज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है; अन्यथा शक्ति रहते हुए यदि यज्ञकर्त्ताने लोभ दिखाया तो उसको चोरी करनेका पाप लगता है और उस कर्ममें भी विपरीतता आ जाती है ॥ ७ ॥
यदेव सुकृतं हव्यं तेन तुष्यन्ति देवताः । नमस्कारेण हविषा स्वाध्यायैरौषधैस्तथा ॥ ८ ॥ पूजा स्याद् देवतानां हि यथा शास्त्रनिदर्शनम् । शुभ कर्मके द्वारा जिस हविष्यका संग्रह किया जाता है, उसीके होमसे देवता संतुष्ट होते हैं। शास्त्रके कथनानुसार नमस्कार, स्वाध्याय, घी और अन्न—इन सबके द्वारा देवताओंकी पूजा हो सकती है ॥ ८ १/२ ॥
इष्टापूर्तादसाधूनां विगुणा जायते प्रजा ॥ ९ ॥ जो लोग कामनाके वशीभूत होकर यज्ञ करते, तालाब खुदवाते या बगीचे लगवाते हैं, उन (सकाम-भावयुक्त) असाधु पुरुषोंसे उन्हींके समान गुणहीन संतान उत्पन्न होती है ॥ ९ ॥
लुब्धेभ्यो जायते लुब्धः समेभ्यो जायते समः । यजमाना यथाऽऽत्मानमृत्विजश्च तथा प्रजाः ॥ १० ॥ लोभी पुरुषोंसे लोभीका जन्म होता है और समदर्शी पुरुषोंसे समदर्शी पुत्र उत्पन्न होता है। यजमान और ऋत्विज् स्वयं जैसे होते हैं, उनकी प्रजा भी वैसी ही होती है ॥ १० ॥
यज्ञात् प्रजा प्रभवति नभसोऽम्भ इवामलम् । अग्नौ प्रास्ताहुतिर्ब्रह्मन्नादित्यमुपगच्छति ॥ ११ ॥ आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः । जिस प्रकार आकाशसे निर्मल जलकी वर्षा होती है उसी प्रकार शुद्ध भावसे किये हुए यज्ञसे योग्य प्रजाकी उत्पत्ति होती है। विप्रवर! अग्निमें डाली हुई आहुति सूर्यमण्डलको प्राप्त होती है, सूर्यसे जलकी वृष्टि होती है, वृष्टिसे अन्न उपजता है और अन्नसे सम्पूर्ण प्रजा जन्म तथा जीवन धारण करती है ॥ ११ १/२ ॥
तस्मात् सुनिष्ठिताः पूर्वे सर्वान् कामांश्च लेभिरे ॥ १२ ॥ अकृष्टपच्या पृथिवी आशीर्भीर्वीरुधोऽभवन् ।