महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 170, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।। १४ ।। यदा न भावं कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।। १५ ।। “जब यह मन, वाणी और क्रियाद्वारा सम्पूर्ण भूतोंके प्रति पाप-बुद्धिका परित्याग कर देता है, तब परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ।। १५ ।। विनीतमानमोहश्च बहुसङ्गविवर्जितः । तदाऽऽत्मज्योतिषः साधोर्निर्वाणमुपपद्यते ।। १६ ।। “जिसके मान और मोह दूर हो गये हैं, जो नाना प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित है तथा जिसे आत्माका ज्ञान प्राप्त हो गया है, उस साधु पुरुषको मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है' ।। १६ ।। इदं तु शृणु मे पार्थ ब्रुवतः संयतेन्द्रियः । धर्ममन्ये वृत्तमन्ये धनमीहन्ति चापरे ।। १७ ।। 'कुन्तीनन्दन! मैं जो बात कह रहा हूँ, उसे अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको संयममें रखकर सुनो! कुछ लोग धर्मकी, कोई सदाचारकी और दूसरे कितने ही मनुष्य धनकी प्राप्तिके लिये सचेष्ट रहते हैं ।। १७ ।। धनहेतोर्य ईहेत तस्यानीहा गरीयसी । भूयान् दोषो हि वित्तस्य यश्च धर्मस्तदाश्रयः ।। १८ ।। 'जो धनके लिये चेष्टा करता है, उसका निश्चेष्ट होकर बैठ रहना ही ठीक है, क्योंकि धन और उसके आश्रित धर्ममें महान् दोष दिखायी देता है ।। १८ ।। प्रत्यक्षमनुपश्यामि त्वमपि द्रष्टुमर्हसि । वर्जनं वर्जनीयानामीहमानेन दुष्करम् ।। १९ ।। 'मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ और तुम भी देख सकते हो, जो लोग धनोपार्जनके प्रयत्नमें लगे हुए हैं, उनके लिये त्याज्य कर्मोंको छोड़ना अत्यन्त कठिन हो रहा है ।। ये वित्तमभिपद्यन्ते सम्यक्त्वं तेषु दुर्लभम् । द्रुह्यतः प्रैति तत् प्राहुः प्रतिकूलं यथातथम् ।। २० ।। 'जो धनके पीछे पड़े हुए हैं, उनमें साधुता दुर्लभ है; क्योंकि जो लोग दूसरोंसे द्रोह करते हैं, उन्हींको धन प्राप्त होता है, ऐसा कहा जाता है तथा वह मिला हुआ धन प्रकारान्तरसे प्रतिकूल ही होता है ।। २० ।। यस्तु सम्भिन्नवृत्तः स्याद् वीतशोकभयो नरः । अल्पेन तृषितो द्रुह्यन् भ्रूणहत्यां न बुध्यते ।। २१ ।। 'शोक और भयसे रहित होनेपर भी जो मनुष्य सदाचारसे भ्रष्ट है, उसे यदि धनकी थोड़ी-सी भी तृष्णा हो तो वह दूसरोंसे ऐसा द्रोह करता है कि भ्रूण-हत्या-जैसे पापका भी ध्यान नहीं रखता ।। २१ ।।