महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1712, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाता अन्नपूर्णाके पास चला जाता है ।। २७ ।। पुत्रपौत्रोपपन्नोऽपि जननीं यः समाश्रितः । अपि वर्षशतस्यान्ते स द्विहायनवच्चरेत् ।। २८ ।। ‘पुत्र और पौत्रोंसे सम्पन्न होनेपर भी जो अपनी माताके आश्रयमें रहता है, वह सौ वर्षकी अवस्थाके बाद भी उसके पास दो वर्षके बच्चेके समान आचरण करता है ।। २८ ।। समर्थं वासमर्थं वा कृशं वाप्यकृशं तथा । रक्षत्येव सुतं माता नान्यः पोष्टा विधानतः ।। २९ ।। ‘पुत्र असमर्थ हो या समर्थ, दुर्बल हो या हृष्ट-पुष्ट, माता उसका पालन करती ही है। माताके सिवा दूसरा कोई विधिपूर्वक पुत्रका पालन-पोषण नहीं कर सकता ।। २९ ।। तदा स वृद्धो भवति तदा भवति दुःखितः । तदा शून्यं जगत् तस्य यदा मात्रा वियुज्यते ।। ३० ।। ‘जब मातासे विछोह हो जाता है, उसी समय मनुष्य अपनेको बूढ़ा समझने लगता है, दुखी हो जाता है और उसके लिये सारा संसार सूना प्रतीत होने लगता है ।। नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः । नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रिया ।। ३१ ।। ‘माताके समान दूसरी कोई छाया नहीं है अर्थात् माताकी छत्रछायामें जो सुख है, वह कहीं नहीं है। माताके तुल्य दूसरा सहारा नहीं है, माताके सदृश अन्य कोई रक्षक नहीं है तथा बच्चेके लिये माँके समान दूसरी कोई प्रिय वस्तु नहीं है ।। ३१ ।। कुक्षिसंधारणाद् धात्री जननाज्जननी स्मृता । अङ्गानां वर्धनादम्बा वीरसूत्वेन वीरसूः ।। ३२ ।। ‘वह गर्भाशयमें धारण करनेके कारण धात्री, जन्म देनेके कारण जननी, शिशुका अङ्गवर्धन (पालन-पोषण) करनेसे अम्बा तथा वीर-संतानका प्रसव करनेके कारण वीरसू कही गयी है ।। ३२ ।। शिशोः शुश्रूषणाच्छुश्रूर्माता देहमनन्तरम् । चेतनावान् नरो हन्याद् यस्य नासुषिरं शिरः ।। ३३ ।। ‘वह शिशुकी शुश्रूषा करके शुश्रू नाम धारण करती है। माता अपना निकटतम शरीर है। जिसका मस्तिष्क विचार शून्य नहीं हो गया है, ऐसा कोई सचेतन मनुष्य कभी अपनी माताकी हत्या नहीं कर सकता ।। ३३ ।। दम्पत्योः प्राणसंश्लेषे योऽभिसंधिः कृतः किल । तं माता च पिता चेति भूतार्थो मातरि स्थितः ।। ३४ ।। ‘पति और पत्नी मैथुनकालमें सुयोग्य पुत्र होनेके लिये जो अभिलाषा करते हैं, उसे यद्यपि पिता और माता—दोनों धारण करते हैं तथापि वास्तवमें वह अभिलाषा मातामें ही प्रतिष्ठित होती है ।। ३४ ।।