महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1718, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिरकारिताको सफल कर ले ॥ ५७ ॥ चिरायते च संतापाच्चिरं स्वपिति वारितः । आवयोश्चिरसंतापादवेक्ष्य चिरकारिकः ॥ ५८ ॥ ‘मेरा बेटा चिरकारी कोई दुःख या संताप प्राप्त होनेपर भी कार्य करनेमें विलम्ब करनेका स्वभाव नहीं छोड़ता है। मना करनेपर भी चिरकालतक सोता रहता है। आज हम दोनों माता-पिताका चिरसंताप देखकर वह अवश्य चिरकारी बने’ ॥ ५८ ॥ एवं स दुःखितो राजन् महर्षिर्गौतमस्तदा । चिरकारिं ददर्शाथ पुत्रं स्थितमथान्तिके ॥ ५९ ॥ राजन्! इस प्रकार दुखी हुए महर्षि गौतमने घर आनेपर अपने पुत्र चिरकारीको पास ही खड़ा देखा ॥ ५९ ॥ चिरकारी तु पितरं दृष्ट्वा परमदुःखितः । शस्त्रं त्यक्त्वा ततो मूर्ध्ना प्रसादायोपचक्रमे ॥ ६० ॥ पिताको उपस्थित देख चिरकारी बहुत दुखी हुआ। वह हथियार फेंककर उनके चरणोंमें मस्तक झुका उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगा ॥ ६० ॥ गौतमस्तं ततो दृष्ट्वा शिरसा पतितं भुवि । पत्नीं चैव निराकारां परामभ्यागमन्मुदम् ॥ ६१ ॥ गौतमने देखा, चिरकारी पृथ्वीपर माथा टेककर पड़ा है और पत्नी लज्जाके मारे निश्चेष्ट खड़ी है। यह देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ६१ ॥ न हि सा तेन सम्भेदं पत्नी नीता महात्मना । विजने चाश्रमस्थेन पुत्रश्चापि समाहितः ॥ ६२ ॥ एकान्त वनमें उस आश्रमके भीतर रहनेवाले महामना गौतमने अपनी पत्नी तथा एकाग्रचित्त पुत्र चिरकारीको कभी अपनेसे अलग नहीं किया ॥ ६२ ॥ हन्या इति समादेशः शस्त्रपाणौ सुते स्थिते । विनीते प्रसवत्यर्थे विवासे चात्मकर्मसु ॥ ६३ ॥ अपने आवश्यक कर्म जप-ध्यान आदिके लिये महर्षि गौतमके बाहर चले जानेपर उनका पुत्र चिरकारी यद्यपि हाथमें हथियार लेकर खड़ा था तथापि माताकी रक्षाके लिये वह विनीतभावसे कुछ सोचता-विचारता रहा। इसीलिये माताको मार डालनेका जो आदेश प्राप्त हुआ था, वह पालित न हो सका ॥ ६३ ॥ बुद्धिश्चासीत् सुतं दृष्ट्वा पितुश्चरणयोर्नतम् । शस्त्रग्रहणचापल्यं संवृणोति भयादिति ॥ ६४ ॥ पुत्रको अपने चरणोंमें नतमस्तक हुआ देख गौतमके मनमें यह विचार हुआ कि सम्भवतः चिरकारी भयके मारे हथियार उठानेकी चपलताको छिपा रहा है ॥ ६४ ॥ ततः पित्रा चिरं स्तुत्वा चिरं चाघ्राय मूर्धनि ।