महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1732, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंबकरा, घोड़ा, भेड़, गाय, पक्षी, ग्राम्य अन्न तथा जंगली अन्न आदि सारी वस्तुएँ प्राणके लिये अन्न हैं—ऐसा श्रुतिका कथन है ॥ १९ ॥ तथैवान्नं ह्यहरहः सायंप्रातर्निरूप्यते । पशवश्चाथ धान्यं च यज्ञस्याङ्गमिति श्रुतिः ॥ २० ॥ प्रतिदिन सबेरे-शाम अन्नको प्राणका भोज्य बताया गया है। पशु और धान्य—ये यज्ञके अंग हैं, ऐसा श्रुति कहती है ॥ २० ॥ एतानि सह यज्ञेन प्रजापतिरकल्पयत् । तेन प्रजापतिर्देवान् यज्ञेनायजत प्रभुः ॥ २१ ॥ भगवान् प्रजापतिने यज्ञके साथ-साथ इन सबकी सृष्टि की। फिर उन प्रजापतिने ही इन यज्ञसामग्रियोंद्वारा देवताओंसे यज्ञका अनुष्ठान कराया ॥ २१ ॥ तदन्योन्यवराः सर्वे प्राणिनः सप्त सप्तधा । यज्ञेषुपाक्तं विश्वं प्राहुरुत्तमसंज्ञितम् ॥ २२ ॥ सात-सात प्रकारके जो ग्राम्य और आरण्य (जंगली) प्राणी हैं, वे सब एक-दूसरेकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं। इन सबमें 'उत्तम' नामसे प्रसिद्ध जो सब-के-सब पुरुष या मनुष्यसंज्ञक प्राणी हैं, उन्हें भी यज्ञके लिये नियुक्त बताया गया है ॥ २२ ॥ एतच्चैवाभ्यनुज्ञातं पूर्वैः पूर्वतरैस्तथा । को जातु न विचिन्वीत विद्वान् स्वां शक्तिमात्मनः ॥ २३ ॥ पूर्ववर्ती तथा अधिक पूर्ववर्ती पुरुषोंने इन समस्त द्रव्योंको यज्ञका अंग माना है, अतः कौन विद्वान् मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार कभी किसी यज्ञको अपने लिये नहीं चुनेगा ॥ २३ ॥ पशवश्च मनुष्याश्च द्रुमाश्चौषधिभिः सह । स्वर्गमेवाभिकांक्षन्ते न च स्वर्गस्ततो मखात् ॥ २४ ॥ पशु, मनुष्य, वृक्ष और ओषधियाँ—ये सब-के-सब स्वर्ग चाहते हैं, परंतु यज्ञको छोड़कर और किसी साधनसे वह विशाल स्वर्गलोक सुलभ नहीं हो सकता है ॥ २४॥ ओषध्यः पशवो वृक्षा वीरुदाज्यं पयो दधि । हविर्भूमिर्दिशः श्रद्धा कालश्चैतानि द्वादश ॥ २५ ॥ ओषधि (अन्न आदि), पशु, वृक्ष, लता, घी, दूध, दही, अन्यान्य हविष्य, भूमि, दिशा, श्रद्धा और काल—ये बारह यज्ञके अंग हैं ॥ २५ ॥ ऋचो यजूंषि सामानि यजमानश्च षोडश । अग्निर्ज्ञेयो गृहपतिः स सप्तदश उच्यते ॥ २६ ॥ ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और यजमान—ये चार मिलकर सोलह यज्ञांग होते हैं तथा गार्हपत्य अग्निको सत्रहवाँ यज्ञांग समझना चाहिये। इस प्रकार ये सत्रह अंग बताये जाते हैं ॥ २६ ॥