महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1744, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार चारों वर्णों और आश्रमोंके लोग सभी प्रवृत्तियोंमें एकमात्र सुखका ही आश्रय लेते हैं—उसीको अपना लक्ष्य बनाकर चलते हैं, अतः सिद्धान्ततः अक्षय सुख क्या है, यह बताइये ॥ ४८ ॥
कपिल उवाच
यद् यदाचरते शास्त्रमर्थ्यं सर्वप्रवृत्तिषु । यस्य यत्र ह्यनुष्ठानं तत्र तत्र निरामयम् ॥ ४९ ॥ **कपिलने कहा—**जो-जो शास्त्र जिस-जिस अर्थका आचरण—प्रतिपादन करता है, वह-वह सभी प्रवृत्तियोंमें सफल होता है। जिस साधनका जहाँ अनुष्ठान होता है, वहाँ-वहाँ अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है ॥ ४९ ॥
ज्ञानं प्लावयते सर्वं यो ज्ञानं ह्यनुवर्तते । ज्ञानादपेत्य या वृत्तिः सा विनाशयति प्रजाः ॥ ५० ॥ जो ज्ञानका अनुसरण करता है, ज्ञान उसके समस्त संसारबन्धनका नाश कर देता है। बिना ज्ञानकी जो प्रवृत्ति होती है, वह प्रजाको जन्म और मरणके चक्करमें डालकर उसका विनाश कर देती है ॥ ५० ॥
भवन्तो ज्ञानिनो व्यक्तं सर्वतश्च निरामयाः । ऐकात्म्यं नाम कश्चिद्धि कदाचिदुपपद्यते ॥ ५१ ॥ आपलोग ज्ञानी हैं, यह बात सर्वविदित है। आप सब ओरसे नीरोग भी हैं; परंतु क्या आपलोगोंमेंसे कोई भी किसी भी कालमें एकात्मताको प्राप्त हुआ है? (जब एकमात्र अद्वितीय आत्मा अर्थात् ब्रह्मकी ही सत्ताका सर्वत्र बोध होने लगे, तब उसे एकात्मताका ज्ञान कहते हैं) ॥ ५१ ॥
शास्त्रं ह्यबुद्ध्वा तत्त्वेन केचिद् वादबलाज्जनाः । कामद्वेषाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ॥ ५२ ॥ शास्त्रको यथार्थरूपसे न जानकर कुछ लोग वितण्डावादके ही बलसे राग-द्वेषसे अभिभूत होनेके कारण अहंकारके अधीन हो गये हैं ॥ ५२ ॥
याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः । ब्रह्मस्तेना निरारम्भा दम्भमोहवशानुगाः ॥ ५३ ॥ वे शास्त्रोंके यथार्थ तात्पर्यको न जाननेके कारण शास्त्रदस्यु (शास्त्रोंके अर्थपर डाका डालनेवाले लुटेरे) कहे जाते हैं। सर्वव्यापी ब्रह्मका भी अपलाप करनेके कारण ब्रह्मचोरकी पदवीसे विभूषित होते हैं। शम-दम आदि साधनोंका कभी अनुष्ठान नहीं करते हैं तथा दम्भ और मोहके वशमें पड़े रहते हैं ॥ ५३ ॥
नैर्गुण्यमेव पश्यन्ति न गुणाननुयुञ्जते । तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥ ५४ ॥