भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1746

अवैदिकमतका आश्रय लेकर शोक किया करते हैं। आप-जैसे ज्ञानियोंको भी सब जन्तुओंके समान ही इन्द्रियोंके विषयोंका अनुभव होता है॥ ६०॥

एवं चतुर्णां वर्णानामाश्रमाणां प्रवृत्तिषु। एकमालम्बमानानां निर्णये सर्वतोदिशम्॥ ६१॥ आनन्त्यं वदमानेन शक्तेनावर्जितात्मना। अविज्ञानहतप्रज्ञा हीनप्रज्ञास्तमोवृताः॥ ६२॥

इस प्रकार चारों वर्णों और आश्रमोंकी जो प्रवृत्तियाँ हैं, उनमें लगे हुए मनुष्य एकमात्र सुखका ही आश्रय लेते हैं—उसे ही प्राप्त करना चाहते हैं। उनमेंसे हम-जैसे लोग अज्ञानसे हतबुद्धि, तुच्छ विषयोंमें मन लगानेवाले तथा तमोगुणसे आवृत हैं। आप ऊहापोह करनेमें समर्थ-कुशल हैं, अतः सार्वदेशिक सिद्धान्तके रूपमें मोक्षसुखकी अनन्तता बताकर आपने मनसे हमें शान्ति पहुँचायी है॥ ६१-६२॥

शक्यं त्वेकेन युक्तेन कृतकृत्येन सर्वशः। पिण्डमात्रं व्यपाश्रित्य चरितुं विजितात्मना॥ ६३॥ वेदवादं व्यपाश्रित्य मोक्षोऽस्तीति प्रभाषितुम्। अपेतन्यायशास्त्रेण सर्वलोकविगर्हिणा॥ ६४॥

जो आपके समान एकाकी, योगयुक्त, कृतकृत्य और मनपर विजय पानेवाला है तथा जो केवल शरीरका अथवा उसकी रक्षाके लिये स्वल्प भिक्षान्नमात्रका सहारा लेकर सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरण कर सकता है, जिसने न्यायशास्त्रका परित्याग कर दिया है तथा जो सम्पूर्ण संसारको नाशवान् होनेके कारण गर्हित समझता है, ऐसा पुरुष ही वेद-वाक्योंका आश्रय लेकर 'मोक्ष है' यह साधिकार कह सकता है॥ ६३-६४॥

इदं तु दुष्करं कर्म कुटुम्बमभिसंश्रितम्। दानमध्ययनं यज्ञः प्रजासंतानमार्जवम्॥ ६५॥

गृहस्थाश्रमके अनुसार जो यह कुटुम्बके भरण-पोषणसे सम्बन्ध रखनेवाला कार्य है तथा दान, स्वाध्याय, यज्ञ, संतानोत्पादन एवं सदा सरल और कोमल भावसे बर्ताव करना रूप जो कर्म है, यह सब मनुष्यके लिये अत्यन्त दुष्कर है॥ ६५॥

यद्येतदेवं कृत्वापि न विमोक्षोऽस्ति कस्यचित्। धिक् कर्तारं च कार्यं च श्रमश्चायं निरर्थकः॥ ६६॥

यदि यह सब दुष्कर कर्म करके भी किसीको मोक्ष नहीं प्राप्त हुआ तो कर्ताको धिक्कार है। उसके उस कार्यको धिक्कार है। और इसमें जो परिश्रम हुआ, वह व्यर्थ हो गया॥ ६६॥

नास्तिक्यमन्यथा च स्याद् वेदानां पृष्ठतः क्रिया। एतस्यानन्त्यमिच्छामि भगवन् श्रोतुमञ्जसा॥ ६७॥