भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1749, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1749

सत्पात्रोंको दान करते हैं, कभी पापकर्मका आश्रय नहीं लेते तथा सदा कर्मयोगके साधनमें ही लगे रहते हैं, उनके मानसिक संकल्पकी सिद्धि होने लगती है और उन्हें विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परब्रह्मके विषयमें दृढ़ निश्चय हो जाता है ॥ ५-६ ॥
अक्रुध्यन्तोऽनसूयन्तो निरहङ्कारमत्सराः ।
ज्ञाननिष्ठास्त्रिशुक्लाश्च सर्वभूतहिते रताः ॥ ७ ॥
वे किसीपर क्रोध नहीं करते, कहीं दोषदृष्टि नहीं रखते, अहंकार तथा मात्सर्यसे दूर रहते हैं, ज्ञानके साधनोंमें उनकी निष्ठा होती है, उनके जन्म, कर्म और विद्या—तीनों ही शुद्ध होते हैं तथा वे समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ ७ ॥
आसन् गृहस्था भूयिष्ठा अव्युत्क्रान्ताः स्वकर्मसु ।
राजानश्च तथा युक्ता ब्राह्मणाश्च यथाविधि ॥ ८ ॥
पूर्वकालमें बहुत-से ब्राह्मण और राजा ऐसे हो गये हैं, जो गृहस्थ आश्रममें ही रहते हुए अपने-अपने कर्मोंका त्याग न करके उनमें निष्काम भावसे विधिपूर्वक लगे रहे ॥ ८ ॥
समा ह्यार्जवसम्पन्नाः संतुष्टा ज्ञाननिश्चयाः ।
प्रत्यक्षधर्माः शुचयः श्रद्दधानाः परावरे ॥ ९ ॥
वे सब प्राणियोंपर समान दृष्टि रखते थे। सरल, संतुष्ट, ज्ञाननिष्ठ, प्रत्यक्ष फल देनेवाले धर्मके अनुष्ठाता और शुद्धचित्त होते थे तथा शब्दब्रह्म एवं परब्रह्म-दोनोंमें ही श्रद्धा रखते थे ॥ ९ ॥
पुरस्ताद् भावितात्मानो यथावच्चरितव्रताः ।
चरन्ति धर्मं कृच्छ्रेऽपि दुर्गे चैवापि संहताः ॥ १० ॥
संहत्य धर्मं चरतां पुराऽऽसीत् सुखमेव तत् ।
तेषां नासीद् विधातव्यं प्रायश्चित्तं कथंचन ॥ ११ ॥
वे आवश्यक नियमोंका यथावत् पालन करके पहले अपने चित्तको शुद्ध करते थे और कठिनाई तथा दुर्गम स्थानोंमें पड़ जानेपर भी परस्पर मिलकर धर्मानुष्ठानमें तत्पर रहते थे। संघ-बद्ध होकर धर्मानुष्ठान करनेवाले उन पूर्ववर्ती पुरुषोंको इसमें सुखका ही अनुभव होता था। उन्हें किसी प्रकारका प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती थी ॥ १०-११ ॥
सत्यं हि धर्ममास्थाय दुराधर्षतमा मताः ।
न मात्रामनुरुध्यन्ते न धर्मच्छलमन्ततः ॥ १२ ॥
वे सत्यधर्मका आश्रय लेकर ही अत्यन्त दुर्धर्ष माने जाते थे। लेशमात्र भी पाप नहीं करते थे और प्राणान्तका अवसर उपस्थित होनेपर भी धर्मके विषयमें छलसे काम नहीं लेते थे ॥ १२ ॥
य एव प्रथमः कल्पस्तमेवाभ्याचरन् सह ।
तेषां नासीद् विधातव्यं प्रायश्चित्तं कदाचन ॥ १३ ॥