भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1757

तदनन्तर उस ब्राह्मणने शान्त मनसे देवताओंके अनुचर कुण्डधार नामक मेघको पास ही खड़ा देखा ।। दृष्ट्वैव तं महाबाहुं तस्य भक्तिरजायत । अयं मे धास्यति श्रेयो वपुरेतद्धि तादृशम् ।। ७ ।। उस महाबाहु मेघको देखते ही ब्राह्मणके मनमें उसके प्रति भक्ति उत्पन्न हो गयी और वह सोचने लगा कि यह अवश्य मेरा कल्याण करेगा; क्योंकि इसका यह शरीर वैसे ही लक्षणोंसे सम्पन्न है ।। ७ ।। संनिकृष्टश्च देवस्य न चान्यैर्मानुषैर्वृतः । एष मे दास्यति धनं प्रभूतं शीघ्रमेव च ।। ८ ।। यह देवताका संनिकटवर्ती है और दूसरे मनुष्योंने इसे घेर नहीं रखा है। इसलिये यह मुझे शीघ्र ही प्रचुर धन देगा ।। ८ ।। ततो धूपैश्च गन्धैश्च माल्यैरुच्चावचैरपि । बलिभिर्विविधाभिश्च पूजयामास तं द्विजः ।। ९ ।। तब ब्राह्मणने धूप, गन्ध, छोटे-बड़े माल्य तथा भाँति-भाँतिके पूजोपहार अर्पित करके कुण्डधार मेघका पूजन किया ।। ९ ।। ततस्त्वल्पेन कालेन तुष्टो जलधरस्तदा । तस्योपकारनियतामिमां वाचमुवाच ह ।। १० ।। इससे वह मेघ थोड़े ही समयमें संतुष्ट हो गया और उसने ब्राह्मणके उपकारमें नियमपूर्वक प्रवृत्ति सूचित करनेवाली यह बात कही— ।। १० ।।