महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1776, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाम, क्रोध, लोभ, भय और निद्रा—ये ही योगसम्बन्धी वे पाँच दोष हैं, जिनको विद्वान् पुरुष जानते हैं। इनका मूलोच्छेद कर देना चाहिये तथा इनका परित्याग करके वाणीको संयममें रखते हुए योगसाधनोंका सेवन करना चाहिये ।। १३-१४ ।।
ध्यानमध्ययनं दानं सत्यं ह्रीरार्जवं क्षमा । शौचमाहारतः शुद्धिरिन्द्रियाणां च संयमः ।। १५ ।। एतैर्विवर्धते तेजः पाप्मानमुपहन्ति च । सिध्यन्ति चास्य संकल्पा विज्ञानं च प्रवर्तते ।। १६ ।।
ध्यान, अध्ययन, दान, सत्य, लज्जा, सरलता, क्षमा, बाहर-भीतरकी पवित्रता, आहारशुद्धि और इन्द्रियोंका संयम—ये ही योगके साधन हैं। इन सबके द्वारा साधकका तेज बढ़ता है। वह अपने पापोंका नाश कर डालता है। उसके संकल्प सिद्ध होने लगते हैं और हृदयमें विज्ञानका आविर्भाव हो जाता है ।। १५-१६ ।।
धूतपापः स तेजस्वी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद् ब्रह्मणः पदम् ।। १७ ।।
इस प्रकार जब पाप धुल जायँ और साधक तेजस्वी, मिताहारी और जितेन्द्रिय हो जाय, तब वह काम और क्रोधको अपने अधीन करके अपने-आपको ब्रह्मपदमें प्रतिष्ठित करनेकी इच्छा करे ।। १७ ।।
अमूढत्वमसंगित्वं कामक्रोधविवर्जनम् । अदैन्यमनुदीर्णत्वमनुद्वेगो व्यवस्थितिः ।। १८ ।। एष मार्गो हि मोक्षस्य प्रसन्नो विमलः शुचिः । तथा वाक्कायमनसां नियमः कामतोऽन्यथा ।। १९ ।।
मूढता और आसक्तिका अभाव, काम और क्रोधका त्याग एवं दीनता, उद्दण्डता तथा उद्वेगसे रहित होना और चित्तकी स्थिरता एवं निष्कामभावसे मन, वाणी और इन्द्रियोंका संयम—यह मोक्षका स्वच्छ, निर्मल एवं पवित्र मार्ग है ।। १८-१९ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि योगाचारानुवर्णनं नाम चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २७४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें योगसम्बन्धी आचारका वर्णन नामक दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २७४ ।।