महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1789, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुप्तं व्याघ्रं महौघो वा मृत्युरादाय गच्छति ।
धर्माचरण करनेसे इस लोकमें प्रसन्नता प्राप्त होती है और मृत्युके पश्चात् परलोकमें
अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है। जिसपर मोहका आवेश होता है, वही स्त्री-पुत्रोंके लिये
तरह-तरहके काम-धंधोंकी खटपटमें लगा रहता है। वह करने और न करने योग्य काम
करके भी इन सबको संतोष देता है। पुत्रों और पशुओंसे सम्पन्न हो जब मनुष्यका मन
उन्हींमें आसक्त रहता है, उसी समय जैसे नदीका महान् जलप्रवाह अपने तटपर सोये हुए
व्याघ्रको बहा ले जाता है, उसी प्रकार मृत्यु उस मनुष्यको लेकर चल देती है ।। १६-१७ १/२
।।
संचिन्वानकमेवैनं कामानामतृप्तकम् ।। १८ ।।
वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति ।
वह भोग-सामग्रियोंका संयम करता और कामनाओंसे अतृप्त ही रहता है। तभी मृत्यु
आकर उसे उसी तरह उठा ले जाती है, जैसे बाघिन भेड़के पास पहुँचकर उसे दबोच लेती
है ।। १८ १/२ ।।
इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत् कृताकृतम् ।। १९ ।।
एवमीहासमायुक्तं मृत्युरादाय गच्छति ।
मनुष्य सोचता है कि यह काम तो मैंने कर लिया, इस कामको अभी करना है और यह
दूसरा कार्य कुछ हदतक हो गया है और शेष बाकी पड़ा है। इस प्रकार मनसूबे बाँधनेमें लगे
हुए उस मनुष्यको मौत लेकर चल देती है ।। १९ १/२ ।।
कृतानां फलमप्राप्तं कार्याणां कर्मसङ्गिनाम् ।। २० ।।
क्षेत्रापणगृहासक्तं मृत्युरादाय गच्छति ।
वह अपने खेत, दूकान और घरके ही चक्करमें पड़ा रहता है। उनके लिये तरह-तरहके
कर्मोंमें फँसता है; परंतु उनका फल मिलने भी नहीं पाता कि मौत उसको इस संसारसे उठा
ले जाती है ।। २० १/२ ।।
दुर्बलं बलवन्तं च प्राज्ञं शूरं जडं कविम् ।। २१ ।।
अप्राप्तसर्वकामार्थं मृत्युरादाय गच्छति ।
मनुष्य दुर्बल हो या बलवान्, बुद्धिमान् हो या शूरवीर अथवा मूर्ख हो या विद्वान्-मृत्यु
उसकी समस्त कामनाओंके पूर्ण होनेसे पहले ही उसे उठा ले जाती है ।। २१ १/२ ।।
मृत्युर्जरा च व्याधिश्च दुःखं चानेककारणम् ।। २२ ।।
असंत्याज्यं यदा मर्त्यैः किं स्वस्थ इव तिष्ठसि ।
पिताजी! जब इस शरीरमें मृत्यु, जरा, व्याधि और अनेक कारणोंसे होनेवाले दुःखोंका
ताँता बँधा ही रहता है और मनुष्य किसी प्रकार भी उनसे अपना पिण्ड नहीं छुड़ा सकते,
तब ऐसी दशामें आप निश्चिन्त-से क्यों बैठे हैं? ।। २२ १/२ ।।।