भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1799, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1799

अस्मिन्नर्थे पुरा गीतं शृणुष्वैकमना नृप । यथा दैत्येन वृत्रेण भ्रष्टैश्वर्येण चेष्टितम् ॥ १३ ॥ निर्जितेनासहायेन हृतराज्येन भारत । अशोचता शत्रुमध्ये बुद्धिमास्थाय केवलम् ॥ १४ ॥ नरेश्वर! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास कहा जाता है। उसे एकचित्त होकर सुनो। भरतनन्दन! पूर्वकालमें वृत्रासुर पराजित और ऐश्वर्य-भ्रष्ट हो गया था। उसका कोई सहायक नहीं रह गया था। देवताओंने उसका राज्य छीन लिया था। उस दशामें पड़कर भी उस असुरने जैसी चेष्टा की थी, उसीका इस कथामें वर्णन है। वह शत्रुओंके बीचमें रहकर भी आसक्तिशून्य बुद्धिका आश्रय ले शोक नहीं करता था ॥ १३-१४ ॥ भ्रष्टैश्वर्यं पुरा वृत्रमुशना वाक्यमब्रवीत् । काचित् पराजितस्याद्य न व्यथा तेऽस्ति दानव ॥ १५ ॥ पूर्वकालकी बात है कि वृत्रासुरको ऐश्वर्यभ्रष्ट हुआ देख शुक्राचार्यने उससे पूछा—'दानवराज! तुम्हें देवताओंने पराजित कर दिया है तो भी आजकल तुम्हारे चित्तमें किसी प्रकारकी व्यथा नहीं है; इसका क्या कारण है?' ॥ १५ ॥

वृत्र उवाच

सत्येन तपसा चैव विदित्वाऽसंशयं ह्यहम् । न शोचामि न हृष्यामि भूतानामागतिं गतिम् ॥ १६ ॥ वृत्रासुरने कहा—ब्रह्मन्! मैंने सत्य और तपके प्रभावसे जीवोंके आवागमनका रहस्य निश्चितरूपसे जान लिया है; इसलिये मैं उसके विषयमें हर्ष और शोक नहीं करता हूँ ॥ १६ ॥ कालसंचोदिता जीवा मज्जन्ति नरकेऽवशाः । परितुष्टानि सर्वाणि दिव्यान्याहुर्मनीषिणः ॥ १७ ॥ कालसे प्रेरित हुए जीव अपने पापकर्मोंके फलस्वरूप विवश होकर नरकमें डूबते हैं और पुण्यके फलसे वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ आनन्द भोगते हैं। ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है ॥ १७ ॥ क्षपयित्वा तु तं कालं गणितं कालचोदिताः । सावशेषेण कालेन सम्भवन्ति पुनः पुनः ॥ १८ ॥ इस प्रकार स्वर्ग अथवा नरकमें कर्मफलभोगद्वारा निश्चित समय व्यतीत करके भोगनेसे बचे हुए कर्म-सहित कालकी प्रेरणासे वे बारंबार इस संसारमें जन्म लेते रहते हैं ॥ १८ ॥ तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च । निर्गच्छन्त्यवशा जीवाः कामबन्धनबन्धनाः ॥ १९ ॥