भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1817

ही तीनों लोकोंकी रचना करते हैं ।। ६२ ।। अवाक् स्थितस्तु यः स्थायी कल्पान्ते परिवर्तते । स शेते भगवानप्सु योऽसावतिबलः प्रभुः । तान् विधाता प्रसन्नात्मा लोकांश्चरति शाश्वतान् ।। ६३ ।। जो परवर्ती सनातन नारायण प्रलयकालमें भी विद्यमान हैं, वे ही अत्यन्त बलशाली और सबके अधीश्वर भगवान् श्रीहरि कल्पान्तमें जलके भीतर शयन करते हैं तथा वे प्रसन्नात्मा सृष्टिकर्ता ईश्वर उन समस्त शाश्वत लोकोंमें विचरण करते हैं ।। ६३ ।। सर्वाण्यशून्यानि करोत्यनन्तः सनातनः संचरते च लोकान् । स चानिरुद्धः सृजते महात्मा तत्स्थं जगत् सर्वमिदं विचित्रम् ।। ६४ ।। अनन्त एवं सनातन भगवान् श्रीहरि समस्त कारणोंको सत्ता और स्फूर्ति देकर परिपूर्ण करते और लीलावपु धारण करके लोकोंमें विचरण करते हैं। उन महापुरुषकी गतिको कोई रोक नहीं सकता। वे ही इस जगत्की सृष्टि करते हैं। उन्हींमें यह सम्पूर्ण विचित्र विश्व प्रतिष्ठित है ।। ६४ ।।

युधिष्ठिर उवाच

वृत्रेण परमार्थज्ञ दृष्टा मन्येऽऽत्मनो गतिः । शुभा तस्मात् स सुखितो न शोचति पितामह ।। ६५ ।। युधिष्ठिरने कहा— परमार्थतत्त्वके ज्ञाता पितामह! मैं समझता हूँ कि वृत्रासुरने आत्माके शुभ एवं यथार्थ स्वरूपका साक्षात्कार कर लिया था; इसीलिये वह सुखी था, शोक नहीं करता था ।। ६५ ।। शुक्लः शुक्लाभिजातीयः साध्यो नावर्ततेऽनघ । तिर्यग्गतेश्च निर्मुक्तो निर्याच्च पितामह ।। ६६ ।। निष्पाप पितामह! वह शुद्ध कुलमें उत्पन्न हुआ था और स्वभावसे भी शुद्ध था। जान पड़ता है वह साध्य नामक देवता ही था; इसीलिये पुनः संसारमें नहीं लौटा। वह पशु-पक्षियोंकी योनि तथा नरकसे छुटकारा पा गया ।। ६६ ।। हारिद्रवर्णे रक्ते वा वर्तमानस्तु पार्थिव । तिर्यगेवानुपश्येत कर्मभिस्तामसैर्वृतः ।। ६७ ।। पृथ्वीनाथ! पीतवर्णवाले देवसर्गमें तथा रक्तवर्णवाले अनुग्रहसर्गमें विद्यमान प्राणी कभी तामस कर्मोंसे आवृत होकर तिर्यग्योनिका भी दर्शन कर सकता है ।। ६७ ।। वयं तु भृशमापन्ना रक्ता दुःखसुखेऽसुखे । कां गतिं प्रतिपत्स्यामो नीलां कृष्णाधमामथ ।। ६८ ।।