भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1827

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द्व्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

वृत्रासुरका वध और उससे प्रकट हुई ब्रह्महत्याका ब्रह्माजीके द्वारा चार स्थानोंमें विभाजन

भीष्म उवाच

वृत्रस्य तु महाराज ज्वराविष्टस्य सर्वशः।
अभवन् यानि लिङ्गानि शरीरे तानि मे शृणु ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— महाराज! ज्वरसे आविष्ट हुए वृत्रासुरके शरीरमें जो लक्षण प्रकट हुए थे, उन्हें मुझसे सुनो ॥ १ ॥

ज्वलितास्योऽभवद् घोरो वैवर्ण्यं चागमत् परम्।
गात्रकम्पश्च सुमहान् श्वासश्चाप्यभवन्महान् ॥ २ ॥
उसके मुखमें विशेष जलन होने लगी। उसकी आकृति बड़ी भयानक हो गयी। अंगकान्ति बहुत फीकी पड़ गयी। शरीर जोर-जोरसे काँपने लगा तथा बड़े वेगसे साँस चलने लगी ॥ २ ॥

रोमहर्षश्च तीव्रोऽभून्निःश्वासश्च महान् नृप।
शिवा चाशिवसंकाशा तस्य वक्त्रात् सुदारुणा ॥ ३ ॥
निष्पपात महाघोरा स्मृतिः सा तस्य भारत।
नरेश्वर! उसके सारे शरीरमें तीव्र रोमांच हो आया। वह लंबी साँस खींचने लगा। भरतनन्दन! वृत्रासुरके मुखसे अत्यन्त भयंकर अकल्याणस्वरूपा महाघोर गीदड़ीके रूपमें उसकी स्मरणशक्ति ही बाहर निकल पड़ी ॥ ३ १/२ ॥

उल्काश्च ज्वलितास्तस्य दीप्ताः पार्श्वे प्रपेदिरे ॥ ४ ॥
गृध्राः कङ्का बलाकाश्च वाचोऽमुञ्चन् सुदारुणाः।
वृत्रस्योपरि संसृष्टाश्चक्रवत् परिबभ्रमुः ॥ ५ ॥
उसके पार्श्वभागमें प्रज्वलित एवं प्रकाशित उल्काएँ गिरने लगीं। गीध, कंक, बगले आदि भयंकर पक्षी अपनी बोली सुनाने लगे और एक-दूसरेसे सटकर वृत्रासुरके ऊपर चक्रकी भाँति घूमने लगे ॥ ४-५ ॥

ततस्तं रथमास्थाय देवाप्यायित आहवे।
वज्रोद्यतकरः शक्रस्तं दैत्यं समवैक्षत ॥ ६ ॥
तदनन्तर महादेवजीके तेजसे परिपुष्ट हो वज्र हाथमें लिये हुए इन्द्रने रथपर बैठकर युद्धमें उस दैत्यकी ओर देखा ॥ ६ ॥

अमानुषमथो नादं स मुमोच महासुरः।