भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1831, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1831

स्थापना वै सुमहती त्वया देव प्रवर्तिता ॥ २६ ॥ आपने सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये यह धर्मकी मर्यादा बाँधी है। देव! आपहीने इस महत्त्वपूर्ण मर्यादाकी स्थापना करके इसे चलाया है ॥ २६ ॥ प्रीते तु त्वयि धर्मज्ञ सर्वलोकेश्वर प्रभो । शक्रादपगमिष्यामि निवासं संविधत्स्व मे ॥ २७ ॥ धर्मके ज्ञाता सर्वलोकेश्वर प्रभो! जब आप प्रसन्न हैं तो मैं इन्द्रको छोड़कर हट जाऊँगी; परंतु आप मेरे लिये निवास-स्थानकी व्यवस्था कर दीजिये ॥ २७ ॥

भीष्म उवाच

तथेति तां प्राह तदा ब्रह्मवध्यां पितामहः । उपायतः स शक्रस्य ब्रह्मवध्यां व्यपोहत् ॥ २८ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तब ब्रह्माजीने ब्रह्महत्यासे कहा—'बहुत अच्छा, मैं तुम्हारे रहनेकी व्यवस्था करता हूँ' ऐसा कहकर उन्होंने उपायद्वारा इन्द्रकी ब्रह्महत्याको दूर किया ॥ २८ ॥ ततः स्वयम्भुवा ध्यातस्तत्र वह्निर्महात्मना । ब्रह्माणमुपसंगम्य ततो वचनमब्रवीत् ॥ २९ ॥ तदनन्तर महात्मा स्वयम्भूने वहाँ अग्निदेवका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही वे ब्रह्माजीके पास आ गये और इस प्रकार बोले— ॥ २९ ॥ प्राप्तोऽस्मि भगवन् देव त्वत्सकाशमनिन्दित । यत् कर्तव्यं मया देव तद् भवान् वक्तुमर्हसि ॥ ३० ॥ 'भगवन्! अनिन्द्य देव! मैं आपके निकट आया हूँ। प्रभो! मुझे जो कार्य करना हो, उसके लिये आप मुझे आज्ञा दें' ॥ ३० ॥

ब्रह्मोवाच

बहुधा विभजिष्यामि ब्रह्मवध्यामिमामहम् । शक्रस्याघविमोक्षार्थं चतुर्थागं प्रतीच्छ वै ॥ ३१ ॥ **ब्रह्माजीने कहा—**अग्निदेव! मैं इन्द्रको पापमुक्त करनेके लिये इस ब्रह्महत्याके कई भाग करूँगा। इसका एक चतुर्थांश तुम भी ग्रहण कर लो ॥ ३१ ॥

अग्निरुवाच

मम मोक्षस्य कोऽन्तो वै ब्रह्मन् ध्यायस्व वै प्रभो । एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वतो लोकपूजित ॥ ३२ ॥ **अग्निने कहा—**ब्रह्मन्! प्रभो! मेरे लिये आपकी आज्ञा शिरोधार्य है, परंतु मैं भी इस ब्रह्महत्यासे मुक्त हो सकूँ, इसके लिये इसकी अन्तिम अवधि क्या होगी, इसपर आप विचार