महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1833, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें‘लोकपितामह! हमारी इस ब्रह्महत्याका अन्त क्या होगा? हम तो यों ही दैवके मारे हुए स्थावर योनिमें पड़े हैं; अतः अब आप पुनः हमें न मारें॥ ३८॥
वयमग्निं तथा शीतं वर्षं च पवनेरितम्।
सहामः सततं देव तथा छेदनभेदने॥ ३९॥
ब्रह्मवध्यामिमामद्य भवतः शासनाद् वयम्।
ग्रहीष्यामस्त्रिलोकेश मोक्षं चिन्तयतां भवान्॥ ४०॥
‘देव! त्रिलोकीनाथ! हमलोग सदा अग्नि और धूपका ताप, सर्दी, वर्षा, आँधी और अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा भेदन-छेदनका कष्ट सहते रहते हैं। आज आपकी आज्ञासे इस ब्रह्महत्याको भी ग्रहण कर लेंगे; किंतु आप इनसे हमारे छुटकारेका उपाय भी तो सोचिये’॥
ब्रह्मोवाच
पर्वकाले तु सम्प्राप्ते यो वै छेदनभेदनम्।
करिष्यति नरो मोहात् तमेषानुगमिष्यति॥ ४१॥
**ब्रह्माजीने कहा—**संक्रान्ति, ग्रहण, पूर्णिमा, अमावास्या आदि पर्वकाल प्राप्त होनेपर जो मनुष्य मोहवश तुम्हारा भेदन-छेदन करेगा, उसीके पीछे तुम्हारी यह ब्रह्महत्या लग जायगी॥ ४१॥
भीष्म उवाच
ततो वृक्षौषधितृणमेवमुक्तं महात्मना।
ब्रह्माणमभिसम्पूज्य जगामाशु यथागतम्॥ ४२॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! महात्मा ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वृक्ष, ओषधि और तृणका समुदाय उनकी पूजा करके जैसे आया था, वैसे ही शीघ्र लौट गया॥
आहूयाप्सरसो देवस्ततो लोकपितामहः।
वाचा मधुरया प्राह सान्त्वयन्निव भारत॥ ४३॥
भारत! तत्पश्चात् लोकपितामह ब्रह्माजीने अप्सराओंको बुलाकर उन्हें मीठे वचनोंद्वारा सान्त्वना देते हुए-से कहा—॥ ४३॥
इयमिन्द्रादनुप्राप्ता ब्रह्मवध्या वराङ्गनाः।
चतुर्थमस्या भागांशं मयोक्ताः सम्प्रतीच्छत॥ ४४॥
‘सुन्दरियो! यह ब्रह्महत्या इन्द्रके पाससे आयी है। तुमलोग मेरे कहनेसे इसका एक चतुर्थांश ग्रहण कर लो’॥
अप्सरस ऊचुः
ग्रहणे कृतबुद्धीनां देवेश तव शासनात्।