महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1841, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवन् क्व नु यान्त्येते देवाः शक्रपुरोगमाः । ब्रूहि तत्त्वेन तत्त्वज्ञ संशयो मे महानयम् ॥ २३ ॥ 'भगवन्! ये इन्द्र आदि देवता कहाँ जा रहे हैं? तत्त्वज्ञ परमेश्वर! ठीक-ठीक बताइये। मेरे मनमें यह महान् संशय उत्पन्न हुआ है' ॥ २३ ॥
महेश्वर उवाच
दक्षो नाम महाभागे प्रजानां पतिरुत्तमः । हयमेधेन यजते तत्र यान्ति दिवौकसः ॥ २४ ॥ महेश्वरने कहा— महाभागे! श्रेष्ठ प्रजापति दक्ष अश्वमेध यज्ञ करते हैं; उसीमें ये सब देवता जा रहे हैं ॥
उमोवाच
यज्ञमेतं महादेव किमर्थं नाधिगच्छसि । केन वा प्रतिषेधेन गमनं ते न विद्यते ॥ २५ ॥ उमा बोलीं— महादेव! इस यज्ञमें आप क्यों नहीं पधार रहे हैं? किस प्रतिबन्धके कारण आपका वहाँ जाना नहीं हो रहा है? ॥ २५ ॥
महेश्वर उवाच
सुरैरेव महाभागे पूर्वमेतदनुष्ठितम् । यज्ञेषु सर्वेषु मम न भाग उपकल्पितः ॥ २६ ॥ महेश्वरने कहा— महाभागे! देवताओंने ही पहले ऐसा निश्चय किया था। उन्होंने सभी यज्ञोंमेंसे किसीमें भी मेरे लिये भाग नियत नहीं किया ॥ २६ ॥
पूर्वोथायोपपन्नेन मार्गेण वरवर्णिनि । न मे सुराः प्रयच्छन्ति भागं यज्ञस्य धर्मतः ॥ २७ ॥ सुन्दरि! पूर्वनिश्चित नियमके अनुसार धर्मकी दृष्टिसे ही देवतालोग यज्ञमें मुझे भाग नहीं अर्पित करते हैं ॥ २७ ॥
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेषु प्रभावाभ्यधिको गुणैः । अजय्यश्चाप्यधृष्यश्च तेजसा यशसा श्रिया ॥ २८ ॥ अनेन ते महाभाग प्रतिषेधेन भागतः । अतीव दुःखमुत्पन्नं वेपथुश्च ममानघ ॥ २९ ॥ उमाने कहा— भगवन्! आप समस्त प्राणियोंमें सबसे अधिक प्रभावशाली, गुणवान्, अजेय, अधृष्य, तेजस्वी, यशस्वी तथा श्रीसम्पन्न हैं। महाभाग! यज्ञमें जो इस प्रकार