भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1845

पशूनामपि धर्मज्ञ दृष्टिप्रत्यवरोधनम् ।। ५३ ।।

हाथियोंके मस्तकमें जो ताप या पीड़ा होती है, वही उनका ज्वर है। पर्वतोंका ज्वर

शिलाजीतके रूपमें प्रकट होता है। सेवारको पानीका ज्वर समझना चाहिये। सर्पोंका ज्वर

केंचुल है। गाय-बैलोंके खुरोंमें जो खोरक नामवाला रोग होता है, वही उनका ज्वर है।

पृथ्वीका ज्वर ऊसरके रूपमें प्रकट होता है। धर्मज्ञ युधिष्ठिर! पशुओंकी दृष्टि-शक्तिका जो

अवरोध होता है, वह भी उनका ज्वर ही है ।। ५२-५३ ।।

रन्ध्रागतमथाश्वानां शिखोद्भेदश्च बर्हिणाम् ।

नेत्ररोगः कोकिलस्य ज्वरः प्रोक्तो महात्मना ।। ५४ ।।

घोड़ोंके गलेके छेदमें जो मांसखण्ड बढ़ जाता है, वही उनका ज्वर है। मोरोंकी

शिखाका निकलना ही उनके लिये ज्वर है। कोकिलका जो नेत्ररोग है, उसे भी महात्मा

शिवने ज्वर बताया है ।। ५४ ।।

अवीनां पित्तभेदश्च सर्वेषामिति नः श्रुतम् ।

शुकानामपि सर्वेषां हिक्किका प्रोच्यते ज्वरः ।। ५५ ।।

समस्त भेड़ोंका पित्तभेद भी ज्वर ही है—यह हमारे सुननेमें आया है। समस्त तोतोंके

लिये हिचकीको ही ज्वर बताया गया है ।। ५५ ।।

शार्दूलेष्वथ धर्मज्ञ श्रमो ज्वर इहोच्यते ।

मानुषेषु तु धर्मज्ञ ज्वरो नामैष भारत ।। ५६ ।।

धर्मज्ञ भरतनन्दन! सिंहोंमें थकावटका होना ही ज्वर कहलाता है; परंतु मनुष्योंमें यह

ज्वरके नामसे ही प्रसिद्ध है ।।

मरणे जन्मनि तथा मध्ये चाविशते नरम् ।

एतन्माहेश्वरं तेजो ज्वरो नाम सुदारुणः ।। ५७ ।।

नमस्यश्चैव मान्यश्च सर्वप्राणिभिरीश्वरः ।

अनेन हि समाविष्टो वृत्रो धर्मभृतां वरः ।। ५८ ।।

भगवान् महेश्वरका तेजरूप यह ज्वर अत्यन्त दारुण है। यह मृत्युकालमें, जन्मके

समय तथा बीचमें भी मनुष्योंके शरीरमें प्रवेश कर जाता है। यह सर्वसमर्थ माहेश्वर ज्वर

समस्त प्राणियोंके लिये वन्दनीय और माननीय है। इसीने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ वृत्रासुरके

शरीरमें प्रवेश किया था ।। ५७-५८ ।।

व्यजृम्भत ततः शक्रस्तस्मै वज्रमवासृजत् ।

प्रविश्य वज्रं वृत्रं च दारयामास भारत ।। ५९ ।।

भारत! उस ज्वरसे पीड़ित होकर जब वह जँभाई लेने लगा, उसी समय इन्द्रने उसपर

वज्रका प्रहार किया। वज्रने उसके शरीरमें घुसकर उसे चीर डाला ।। ५९ ।।

दारितश्च स वज्रेण महायोगी महासुरः ।

जगाम परमं स्थानं विष्णोरमिततेजसः ।। ६० ।।