भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1862, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1862

हिरण्य (सुवर्ण) को उत्पन्न करनेके कारण हिरण्यगर्भ कहलाते हैं। सुवर्णके ही कवच और मुकुट धारण करनेसे आपको हिरण्यकवच और हिरण्यचूड कहा गया है। आप सुवर्णके अधिपति हैं। आपको सादर नमस्कार है ॥ ८३ ॥ नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तूयमानाय वै नमः । सर्वाय सर्वभक्षाय सर्वभूतान्तरात्मने ॥ ८४ ॥ जिनकी स्तुति हो चुकी है, वे आप हैं। जो स्तुतिके योग्य हैं, वे भी आप हैं और जिनकी स्तुति हो रही है, वे भी आप ही हैं। आप सर्वस्वरूप, सर्वभक्षी और सम्पूर्ण भूतोंके अन्तरात्मा हैं। आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ८४ ॥ नमो होत्रेऽथ मन्त्राय शुक्लध्वजपताकिने । नमो नाभाय नाभ्याय नमः कटकटाय च ॥ ८५ ॥ आप ही होता और मन्त्र हैं। आपको नमस्कार है। आपकी ध्वजा और पताकाका रंग श्वेत है। आपको नमस्कार है। आप नाभ (नाभिमें सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाले), नाभ्य (संसार-चक्रके नाभि-स्थान) तथा कट-कट (आवरणके भी आवरण) हैं। आपको नमस्कार है ॥ ८५ ॥ नमोऽस्तु कृशनासाय कृशाङ्गाय कृशाय च । संहृष्टाय विहृष्टाय नमः किलकिलाय च ॥ ८६ ॥ आपकी नासिका कृश (पतली) है, इसलिये आप कृशनस कहलाते हैं। आपके अवयव कृश होनेसे आपको कृशांग तथा शरीर दुबला होनेसे कृश कहते हैं। आप अत्यन्त हर्षोल्लाससे परिपूर्ण, विशेष हर्षका अनुभव करनेवाले और हर्षकी किल-किल ध्वनि हैं। आपको नमस्कार है ॥ ८६ ॥ नमोऽस्तु शयमानाय शयितायोत्थिताय च । स्थिताय धावमानाय मुण्डाय जटिलाय च ॥ ८७ ॥ आप समस्त प्राणियोंके भीतर शयन करनेवाले अन्तर्यामी पुरुष हैं। प्रलयकालमें योगनिद्राका आश्रय लेकर सोते और सृष्टिके प्रारम्भकालमें कल्पान्त निद्रासे जागते हैं। आप ब्रह्मरूपसे सर्वत्र स्थित और कालरूपसे सदा दौड़नेवाले हैं। मूँड मुँड़ानेवाले संन्यासी और जटाधारी तपस्वी भी आपके ही स्वरूप हैं। आपको नमस्कार है ॥ ८७ ॥ नमो नर्तनशीलाय मुखवादित्रवादिने । नाद्योपहारलुब्धाय गतिवादित्रशालिने ॥ ८८ ॥ आपका ताण्डव-नृत्य बराबर चलता रहता है। आप मुखसे शृंगी आदि बाजे बजानेमें कुशल हैं। कमलपुष्पकी भेंट लेनेके लिये सदा उत्सुक रहते हैं। गाने और बजानेकी कलामें तत्पर रहकर आप बड़ी शोभा पाते हैं। आपको प्रणाम है ॥ ८८ ॥ नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलप्रमथनाय च । कालनाथाय कल्याय क्षयायोपक्षयाय च ॥ ८९ ॥