महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1872, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंशशः शशाङ्कः शमनः शीतोष्णक्षुज्जराधिकृत् । आधयो व्याधयश्चैव व्याधिहा व्याधिरेव च ॥ १५३ ॥
आप अधर्मके नाशक, महापार्श्व, चण्डधार, गणाधिप, गोनर्द, गौओंको आपत्तिसे बचानेवाले, नन्दीकी सवारी करनेवाले, त्रैलोक्यरक्षक, गोविन्द (श्रीकृष्णरूप), गोमार्ग (इन्द्रियोंके संचालक), अमार्ग (इन्द्रियोंके अगोचर), श्रेष्ठ, स्थिर, स्थाणु, निष्कम्प, कम्प, दुर्वारण (जिनका सामना करना कठिन है, ऐसे), दुर्विषह (असह्य वेगवाले), दुःसह, दुर्लङ्घ्य, दुर्द्धर्ष, दुष्प्रकम्प, दुर्विष, दुर्जय, जय, शश (शीघ्रगामी), शशांक (चन्द्रमा) तथा शमन (यमराज) हैं। सर्दी-गर्मी, क्षुधा, वृद्धावस्था तथा मानसिक चिन्ताको दूर करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही आधि-व्याधि तथा उसे दूर करनेवाले हैं ॥ १५०—१५३ ॥
मम यज्ञमृगव्याधो व्याधीनामागमो गमः । शिखण्डी पुण्डरीकाक्षः पुण्डरीकवनालयः ॥ १५४ ॥ दण्डधारस्त्र्यम्बकश्च उग्रदण्डोऽण्डनाशनः । विषाग्निपाः सुरश्रेष्ठः सोमपास्त्वं मरुत्पतिः ॥ १५५ ॥
मेरे यज्ञरूपी मृगके वधिक तथा व्याधियोंको लाने और मिटानेवाले भी आप ही हैं। (कृष्णरूपमें) मस्तकपर शिखण्ड (मोरपंख) धारण करनेके कारण आप शिखण्डी हैं। आप कमलके समान नेत्रोंवाले, कमलके वनमें निवास करनेवाले, दण्ड धारण करनेवाले, त्र्यम्बक, उग्रदण्ड और ब्रह्माण्डके संहारक हैं। विषाग्निको पी जानेवाले, देवश्रेष्ठ, सोमरसका पान करनेवाले और मरुद्गणोंके स्वामी हैं ॥ १५४-१५५ ॥
अमृतपास्त्वं जगन्नाथ देवदेव गणेश्वरः । विषाग्निपा मृत्युपाश्च क्षीरपाः सोमपास्तथा । मधुश्च्युतानामग्रपास्त्वमेव तुषिताद्यपाः ॥ १५६ ॥
देवाधिदेव! जगन्नाथ! आप अमृत पान करनेवाले और गणोंके स्वामी हैं। विषाग्नि तथा मृत्युसे रक्षा करनेवाले और दूध एवं सोमरसका पान करनेवाले हैं। आप सुखसे भ्रष्ट हुए जीवोंके प्रधान रक्षक तथा तुषितनामक देवताओंके आदिभूत ब्रह्माजीका भी पालन करनेवाले हैं ॥ १५६ ॥
हिरण्यरेताः पुरुषस्त्वमेव त्वं स्त्री पुमांस्त्वं च नपुंसकं च । बालो युवा स्थविरो जीर्णदंष्ट्र- स्त्वं नागेन्द्र शक्रस्त्वं विश्वकृद्विश्वकर्ता ॥ १५७ ॥ विश्वकृद् विश्वकृतां वरेण्यस्त्वं विश्ववाहो विश्वरूपस्तेजस्वी विश्वतोमुखः । चन्द्रादित्यौ चक्षुषी ते हृदयं च पितामहः ॥ १५८ ॥