भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1874, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1874

जटिले दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे । कमण्डलुनिषङ्गाय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥ १६५ ॥ जो सदा जटा और दण्ड धारण किये रहते हैं, जिनका उदर और शरीर विशाल है तथा कमण्डलु ही जिनके लिये तरकसका काम देता है, ऐसे ब्रह्माजीके रूपमें विराजमान भगवान् शिवको प्रणाम है ॥ १६५ ॥ यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसंधिषु । कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः ॥ १६६ ॥ जिनके केशोंमें बादल, शरीरकी संधियोंमें नदियाँ और उदरमें चारों समुद्र हैं, उन जलस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ १६६ ॥ सम्भक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते पर्युपस्थिते । यः शेते जलमध्यस्थस्तं प्रपद्येऽम्बुशायिनम् ॥ १६७ ॥ जो प्रलयकाल उपस्थित होनेपर सब प्राणियोंका संहार करके एकार्णवके जलमें शयन करते हैं, उन जलशायी भगवान्‌की मैं शरण लेता हूँ ॥ १६७ ॥ प्रविश्य वदनं राहोर्यः सोमं पिबते निशि । ग्रसत्यर्कं च स्वर्भानुर्भूत्वा मां सोऽभिरक्षतु ॥ १६८ ॥ जो रातमें राहुके मुखमें प्रवेश करके स्वयं चन्द्रमाके अमृतका पान करते हैं; तथा स्वयं ही राहु बनकर सूर्यपर ग्रहण लगाते हैं, वे परमात्मा मेरी रक्षा करें ॥ ये चानुपतिता गर्भा यथा भागानुपासते । नमस्तेभ्यः स्वधा स्वाहा प्राप्नुवन्तु मुदन्तु ते ॥ १६९ ॥ ब्रह्माजीके बाद उत्पन्न होनेवाले जो देवता और पितर बालककी भाँति यज्ञमें अपने-अपने भाग ग्रहण करते हैं, उन्हें नमस्कार है। वे ‘स्वाहा और स्वधा’ के द्वारा अपने भाग प्राप्त करके प्रसन्न हों ॥ १६९ ॥ येऽङ्गुष्ठमात्राः पुरुषा देहस्थाः सर्वदेहिनाम् । रक्षन्तु ते हि मां नित्यं नित्यं चाप्याययन्तु माम् ॥ १७० ॥ जो अंगुष्ठमात्र जीवके रूपमें सम्पूर्ण देहधारियोंके भीतर विराजमान हैं, वे सदा मेरी रक्षा और वृद्धि करें ॥ ये न रोदन्ति देहस्था देहिनो रोदयन्ति च । हर्षयन्ति न हृष्यन्ति नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः ॥ १७१ ॥ जो देहके भीतर रहते हुए स्वयं न रोकर देहधारियोंको ही रुलाते हैं, स्वयं हर्षित न होकर उन्हें ही हर्षित करते हैं, उन सब रुद्रोंको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ ॥ १७१ ॥ ये नदीषु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च । वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारे गहनेषु च ॥ १७२ ॥ चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु तटेषु च ।