भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1877

तस्य चीर्णस्य तत् सम्यक् फलं भवति पुष्कलम् ।

तच्चास्तु ते महाभाग त्यज्यतां मानसो ज्वरः ।। १९० ।।

‘दक्ष! मैंने पूर्वकालमें एक शुभकारक पाशुपत नामक व्रतको प्रकट किया था, जो

अपूर्व है। साधन और सिद्धि सभी अवस्थाओंमें सब प्रकारसे कल्याणकारी, सर्वतोमुखी

(सभी वर्णों और आश्रमोंके अनुकूल) तथा मोक्षका साधक होनेके कारण अविनाशी है।

वर्षोंतक पुण्यकर्म करने और यम-नियम नामक दस साधनोंको अभ्यासमें लानेसे उसकी

उपलब्धि होती है। वह गूढ़ है। मूर्ख मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं। वह समस्त वर्णधर्म और

आश्रम-धर्मके अनुकूल, सम और किसी-किसी अंशमें विपरीत भी है। जिन्हें सिद्धान्तका

ज्ञान है उन्होंने इसे अपनानेका पूर्ण निश्चय कर लिया है। यह व्रत सभी आश्रमोंसे बढ़कर है।

इसके अनुष्ठानसे उत्तम एवं प्रचुर फलकी प्राप्ति होती है। महाभाग! उस पाशुपत व्रतके

अनुष्ठानका फल तुम्हें प्राप्त हो। अब तुम अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर

दो' ।। १८८-१९० ।।

एवमुक्त्वा महादेवः सपत्नीकः सहानुगः ।

अदर्शनमनुप्राप्तो दक्षस्यामितविक्रमः ।। १९१ ।।

दक्षसे ऐसा कहकर पत्नी और पार्षदोंसहित अमित पराक्रमी महादेवजी वहीं अन्तर्धान

हो गये ।।

दक्षप्रोक्तं स्तवमिमं कीर्तयेद् यः शृणोति वा ।

नाशुभं प्राप्नुयात् किंचिद् दीर्घमायुरवाप्नुयात् ।। १९२ ।।

जो मनुष्य दक्षके द्वारा कहे हुए इस स्तोत्रका कीर्तन अथवा श्रवण करेगा, उसे कोई

अमंगल नहीं प्राप्त होगा। वह दीर्घ आयु प्राप्त करता है ।। १९२ ।।

यथा सर्वेषु देवेषु वरिष्ठो भगवान् शिवः ।

तथा स्तवो वरिष्ठोऽयं स्तवानां ब्रह्मसम्मितः ।। १९३ ।।

जैसे भगवान् शिव सब देवताओंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार यह वेदतुल्य स्तोत्र सभी

स्तुतियोंमें श्रेष्ठ है ।।

यशोराज्यसुखैश्वर्यकामार्थधनकांक्षिभिः ।

श्रोतव्यो भक्तिमास्थाय विद्याकामैश्च यत्नतः ।। १९४ ।।

यश, राज्य, सुख, ऐश्वर्य, काम, अर्थ, धन और विद्याकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको

भक्तिभावका आश्रय लेकर यत्नपूर्वक इस स्तोत्रका श्रवण करना चाहिये ।।

व्याधितो दुःखितो दीनश्चोरग्रस्तो भयार्दितः ।

राजकार्याभियुक्तो वा मुच्यते महतो भयात् ।। १९५ ।।

रोगी, दुखी, दीन, चोरके हाथमें पड़ा हुआ, भयभीत तथा राजकार्यका अपराधी मनुष्य

भी इस स्तोत्रका पाठ करनेसे महान् भयसे छुटकारा पा जाता है ।। १९५ ।।

अनेनैव तु देहेन गणानां समतां व्रजेत् ।