महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1881, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे कछुआ यहाँ अपने अंगोंको फैलाकर फिर समेट लेता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंके शरीर आकाश आदि पाँच महाभूतोंसे उत्पन्न होते और फिर उन्हींमें लीन हो जाते हैं॥ ६ ॥ आकाशात् खलु यो घोषः संघातस्तु महीगुणः । वायोःप्राणो रसस्त्वद्भ्यो रूपं तेजस उच्यते ॥ ७ ॥ शरीरमें जो शब्द होता है, वह आकाशका गुण है। यह स्थूल शरीर पृथिवीका गुण या कार्य है। प्राण वायुका, रस जलका तथा रूप तेजका गुण बताया जाता है॥ ७ ॥ इत्येतन्मयमेवैतत् सर्वं स्थावरजङ्गमम् । प्रलये च तमभ्येति तस्मादुद्दिश्यते पुनः ॥ ८ ॥ इस प्रकार यह समस्त स्थावर-जङ्गम शरीर पञ्चभूतमय ही है। प्रलयकालमें यह परमात्मामें ही लीन होता है और सृष्टिके आरम्भमें पुनः उन्हींसे प्रकट हो जाता है॥ महाभूतानि पञ्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत् । विषयान् कल्पयामास यस्मिन् यदनुपश्यति ॥ ९ ॥ सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले ईश्वरने समस्त प्राणियोंमें पञ्चमहाभूतोंका ही विभागपूर्वक समावेश किया है। देहके भीतर जिस भूतके स्थित होनेसे मनुष्य जो कार्य देखता है, वह बताता हूँ; सुनो॥ ९ ॥ शब्दश्रोत्रे तथा खानि त्रयमाकाशयोनिजम् । रसः स्नेहश्च जिह्वा च अपामेते गुणाः स्मृताः ॥ १० ॥ शब्द, श्रोत्रेन्द्रिय और सम्पूर्ण छिद्र—ये तीन आकाशके कार्य हैं। रस, स्नेह तथा जिह्वा—ये तीनों जलके गुण या कार्य माने गये हैं॥ १० ॥ रूपं चक्षुर्विपाकश्च त्रिविधं ज्योतिरुच्यते । घ्रेयं घ्राणं शरीरं च एते भूमिगुणाः स्मृताः ॥ ११ ॥ रूप, नेत्र और परिपाक—इन तीन गुणोंके रूपमें तेजकी ही स्थिति बतायी जाती है। गन्ध, घ्राण तथा शरीर—ये तीनों भूमिके गुण माने गये हैं॥ ११ ॥ प्राणः स्पर्शश्च चेष्टा च वायोरैते गुणाः स्मृताः । इति सर्वगुणा राजन् व्याख्याताः पाञ्चभौतिकाः ॥ १२ ॥ प्राण, स्पर्श और चेष्टा—ये तीनों वायुके गुण बताये गये हैं। राजन्! इस प्रकार मैंने समस्त पाञ्चभौतिक गुणोंकी व्याख्या कर दी॥ १२ ॥ सत्त्वं रजस्तमः कालः कर्म बुद्धिश्च भारत । मनःषष्ठानि चैतेषु ईश्वरः समकल्पयत् ॥ १३ ॥ भरतनन्दन! ईश्वरने इन प्राणियोंके शरीरोंमें सत्त्व, रज, तम, काल, कर्म, बुद्धि तथा मनसहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंकी कल्पना की है॥ १३ ॥ यदूर्ध्वं पादतलयोरवाङ् मूर्ध्नश्च पश्यसि ।