महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1886, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार बुद्धिकी चिन्तास्वरूप इस सुदृढ़ हृदयग्रन्थिको त्यागकर शोक और संशयसे रहित हो सुखपूर्वक रहना चाहिये ।। ४२ ।। ताम्येयुः प्रच्युताः पृथ्वीं मोहपूर्णां नदीं नराः । यथा गाधमविद्वांसो बुद्धियोगमयं तथा ।। ४३ ।। जलकी गहराईको न जाननेवाले मनुष्य जैसे नदीके तल-प्रदेशमें जाकर दुःखका अनुभव करते हैं, उसी प्रकार बुद्धियोग (ज्ञान)-से अनभिज्ञ सभी मनुष्य इस मोहपूर्ण विशाल संसारनदीमें पड़कर क्लेश भोगते हैं ।। ४३ ।। नैव ताम्यन्ति विद्वांसः प्लवन्तः पारमम्भसः । अध्यात्मविदुषो धीरा ज्ञानं तु परमं प्लवः ।। ४४ ।। जो तैरनेकी कला जानते हैं, वे तैरकर अगाध जलसे पार हो जाते हैं। उन्हें कष्ट नहीं भोगना पड़ता। उसी प्रकार अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता धीर पुरुष अनायास संसार-सागरको पार कर जाते हैं। उनके लिये परम ज्ञान ही जहाज बन जाता है ।। ४४ ।। न भवति विदुषां महद्भयं यदविदुषां सुमहद्भयं भवेत् । न हि गतिरधिकास्ति कस्यचित् सकृदुपदर्शयतीह तुल्यताम् ।। ४५ ।। अज्ञानियोंको जिस संसारसे महान् भय बना रहता है, उससे ज्ञानियोंको वह गुरुतर भय तनिक भी नहीं प्राप्त होता है। ज्ञानी पुरुषोंमेंसे किसीको भी अधिक या न्यून गति नहीं प्राप्त होती—वे सब समान गतिके भागी होते हैं। ‘सकृद्विभातो ह्येष ब्रह्मलोकः’ इत्यादि श्रुति यहाँ ज्ञानियोंकी गतिकी समानता दिखाती है ।। ४५ ।। यत् करोति बहुदोषमेकत- स्तच्च दूषयति यत्पुरा कृतम् । नाप्रियं तदुभयं करोत्यसौ यच्च दूषयति यत् करोति च ।। ४६ ।। अज्ञानावस्थामें मनुष्य जो अनेक दोषसे युक्त कर्म करता है और वह पहलेके जो कर्म कर चुका है, उनके लिये शोक करता है। इसके सिवा अज्ञानावस्थामें जो वह दूसरेके किये हुए अप्रिय कर्मको दोषरूपमें देखता है और राग आदि दोषके कारण स्वयं जो दूषित कर्म करता है, वह दोनों ही प्रकारका कार्य वह ज्ञान होनेके बाद नहीं करता है ।। ४६ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पाञ्चभौतिके पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २८५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पाञ्चभौतिक तत्त्वोंका वर्णनविषयक दो सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८५ ।।