महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1924, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो मौसमका विचार करके अपनी शक्तिके अनुसार प्यासे और भूखे अतिथिको ठंडा या गरम किया हुआ जल और अन्न पवित्रभावसे अर्पण करता है, वह उत्तम फल पाता है ।। ६ ।।
रन्तिदेवेन लोकेश सिद्धिः प्राप्ता महात्मना । फलपत्रैरथो मूलैर्मुनीनर्चितवांश्च सः ॥ ७ ॥ महात्मा राजा रन्तिदेवने फल-मूल और पत्तोंसे ऋषि-मुनियोंका पूजन किया था। इसीसे उन्हें वह सिद्धि प्राप्त हुई, जिसकी सब लोग अभिलाषा रखते हैं ।। ७ ।।
तैरेव फलपत्रैश्च स माठरमतोषयत् । तस्माल्लेभे परं स्थानं शैब्योऽपि पृथिवीपतिः ॥ ८ ॥ पृथ्वीपालक महाराज शैब्यने भी उन फल और पत्रोंसे ही माठर मुनिको संतुष्ट किया था, जिससे उन्हें उत्तम लोककी प्राप्ति हुई ।। ८ ।।
देवतातिथिभृत्येभ्यः पितृभ्यश्चात्मनस्तथा । ऋणवान् जायते मर्त्यस्तस्मादनृणतां व्रजेत् ॥ ९ ॥ प्रत्येक मनुष्य देवता, अतिथि, भरण-पोषणके योग्य कुटुम्बीजन, पितर तथा अपने-आप़का भी ऋणी होकर जन्म लेता है; अतः उसे उस ऋणसे मुक्त होनेका यत्न करना चाहिये ।। ९ ।।
स्वाध्यायेन महर्षिभ्यो देवेभ्यो यज्ञकर्मणा । पितृभ्यः श्राद्धदानेन नृणामभ्यर्चनेन च ॥ १० ॥ वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करके ऋषियोंके, यज्ञ-कर्मद्वारा देवताओंके, श्राद्ध और दानसे पितरोंके तथा स्वागत-सत्कार, सेवा आदिसे अतिथियोंके ऋणसे छुटकारा होता है ।। १० ।।
वाचा शेषावहार्येण पालनेनात्मनोऽपि च । यथावद् भृत्यवर्गस्य चिकीर्षेत् कर्म आदितः ॥ ११ ॥ इसी प्रकार वेद-वाणीके पठन, श्रवण एवं मननसे, यज्ञशेष अन्नके भोजनसे तथा जीवोंकी रक्षा करनेसे मनुष्य अपने ऋणसे मुक्त होता है। भरणीय कुटुम्बीजनके पालन-पोषणका आरम्भसे ही प्रबन्ध करना चाहिये। इससे उनके ऋणसे भी मुक्ति हो जाती है ।। ११ ।।
प्रयत्नेन च संसिद्धा धनैरपि विवर्जिताः । सम्यग् हुत्वा हुतवहं मुनयः सिद्धिमागताः ॥ १२ ॥ ऋषि-मुनियोंके पास धन नहीं था तो भी वे अपने प्रयत्नसे ही सिद्ध हो गये। उन्होंने विधिपूर्वक अग्निहोत्र करके सिद्धि प्राप्त की थी ।। १२ ।।
विश्वामित्रस्य पुत्रत्वमृचीकतनयोऽगमत् । ऋग्भिः स्तुत्वा महाबाहो देवान् वै यज्ञभागिनः ॥ १३ ॥