भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1932, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1932

न होते आये हों, उसे स्वयं इनका आरम्भ नहीं करना चाहिये। जिसके यहाँ पहलेसे इन्हें करनेकी प्रथा हो, वह भी छोड़ दे तो महान् धर्म होता है—ऐसा शास्त्रका निर्णय है ॥

संसिद्धः पुरुषो लोके यदाचरति पापकम् । मदेनाभिप्लुतमनास्तच्च न ग्राह्यमुच्यते ॥ ७ ॥ यदि कोई जगत्में प्रसिद्ध हुआ पुरुष घमण्डमें आकर या मनमें लोभ भरा रहनेके कारण पापाचरण करने लगे तो उसका वह कार्य अनुकरण करने योग्य नहीं बताया गया है ॥ ७ ॥

श्रूयन्ते हि पुराणेषु प्रजा धिग्दण्डशासनाः । दान्ता धर्मप्रधानाश्च न्यायधर्मानुवृत्तिकाः ॥ ८ ॥ पुराणोंमें सुना जाता है कि पहले अधिकांश मनुष्य संयमी, धार्मिक तथा न्यायोचित आचारका ही अनुसरण करनेवाले थे। उस समय अपराधियोंको धिक्कारमात्रका ही दण्ड दिया जाता था ॥ ८ ॥

धर्म एव सदा नृणामिह राजन् प्रशस्यते । धर्मवृद्धा गुणानैव सेवन्ते हि नरा भुवि ॥ ९ ॥ राजन्! इस जगत्में सदा मनुष्योंके धर्मकी ही प्रशंसा होती आयी है। धर्ममें बढ़े-चढ़े लोग इस भूतलपर केवल सद्गुणोंका ही सेवन करते हैं ॥ ९ ॥

तं धर्ममसुरास्तात नामृष्यन्त जनाधिप । विवर्धमानाः क्रमशस्तत्र तेऽन्वाविशन् प्रजाः ॥ १० ॥ तात! जनेश्वर! परंतु उस धर्मको असुर नहीं सह सके। वे क्रमशः बढ़ते हुए प्रजाके शरीरमें समा गये ॥ १० ॥

तासां दर्पः समभवत् प्रजानां धर्मनाशनः । दर्पात्मनां ततः पश्चात् क्रोधस्तासामजायत ॥ ११ ॥ तब प्रजाओंमें धर्मको नष्ट करनेवाला दर्प प्रकट हुआ। फिर जब प्रजाओंके मनमें दर्प आ गया, तब क्रोधका भी प्रादुर्भाव हो गया ॥ ११ ॥

ततः क्रोधाभिभूतानां वृत्तं लज्जासमन्वितम् । ह्रीश्चैवाप्यनशद् राजंस्ततो मोहो व्यजायत ॥ १२ ॥ राजन्! तदनन्तर क्रोधसे आक्रान्त होनेपर मनुष्योंके लज्जायुक्त सदाचारका लोप हो गया। उनका संकोच भी जाता रहा। इसके बाद उनमें मोहकी उत्पत्ति हुई ॥ १२ ॥

ततो मोहपरीतास्ता नापश्यन्त यथा पुरा । परस्परावमर्देन वर्धयन्त्यो यथासुखम् ॥ १३ ॥ मोहसे घिर जानेपर उनमें पहले-जैसी विवेकपूर्ण दृष्टि नहीं रह गयी; अतः वे परस्पर एक-दूसरेका विनाश करके अपने-अपने सुखको बढ़ानेकी चेष्टा करने लगे ॥ १३ ॥

ताः प्राप्य तु स धिग्दण्डो न कारणमतोऽभवत् ।