महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1934, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंथा ।। २१ ।। तस्मात् तेनैव भावेन सानुषङ्गेण पार्थिवाः । आसुराण्येव कर्माणि न्यसेवन् भीमविक्रमाः ।। २२ ।। अतः उसी आनुषंगिक आसुरभावसे युक्त होकर कितने ही भयंकर पराक्रमी भूपाल असुरोचित कर्मोंका ही सेवन करने लगे ।। २२ ।। प्रत्यतिष्ठंश्च तेष्वेव तान्येव स्थापयन्त्यपि । भजन्ते तानि चाद्यापि ये बालिशतरा नराः ।। २३ ।। जो मनुष्य अत्यन्त मूर्ख हैं, वे आज भी उन्हीं आसुरभावोंमें स्थित हैं, उन्हींकी स्थापना करते हैं और उन्हींको सब प्रकारसे अपनाते हैं ।। २३ ।। तस्मादहं ब्रवीमि त्वां राजन् संचिन्त्य शास्त्रतः । संसिद्धाधिगमं कुर्यात् कर्म हिंसात्मकं त्यजेत् ।। २४ ।। अतः राजन्! मैं शास्त्रके अनुसार खूब सोच-विचारकर कहता हूँ कि मनुष्यको उन्नत होनेका प्रयत्न तो करना चाहिये, किंतु हिंसात्मक कर्मका त्याग कर देना चाहिये ।। २४ ।। न संकरेण द्रविणं प्रचिन्वीयाद् विचक्षणः । धर्मार्थं न्यायमुत्सृज्य न तत् कल्याणमुच्यते ।। २५ ।। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह धर्म करनेके लिये न्यायको त्यागकर पापमिश्रित मार्गसे धनका संग्रह न करे; क्योंकि उसे कल्याणकारी नहीं बताया जाता है ।। २५ ।। स त्वमेवंविधो दान्तः क्षत्रियः प्रियबान्धवः । प्रजा भृत्यांश्च पुत्रांश्च स्वधर्मेणानुपालय ।। २६ ।। नरेश्वर! तुम भी इसी प्रकार जितेन्द्रिय क्षत्रिय होकर बन्धु-बान्धवोंसे प्रेम रखते हुए प्रजा, भृत्य और पुत्रोंका स्वधर्मके अनुसार पालन करो ।। २६ ।। इष्टानिष्टसमायोगो वैरं सौहार्दमेव च । अथ जातिसहस्राणि बहूनि परिवर्तते ।। २७ ।। इष्ट और अनिष्टका संयोग, वैर और सौहार्द—इन सबका अनुभव करते-करते जीवके कई सहस्र जन्म बीत जाते हैं ।। २७ ।। तस्माद् गुणेषु रज्येथा मा दोषेषु कथंचन । निर्गुणोऽपि हि दुर्बुद्धिरात्मनः सोऽतिरज्यते ।। २८ ।। इसलिये तुम सद्गुणोंमें ही अनुराग रखो, दोषोंमें किसी प्रकार नहीं; क्योंकि गुणहीन और दुर्बुद्धि मनुष्य भी अपने गुणोंके अभिमानसे अत्यन्त संतुष्ट रहता है ।। मानुषेषु महाराज धर्माधर्मौ प्रवर्ततः । न तथान्येषु भूतेषु मनुष्यरहितेष्विह ।। २९ ।। महाराज! यहाँ मनुष्योंमें जैसे धर्म और अधर्म निवास करते हैं, उस प्रकार मनुष्येतर अन्य प्राणियोंमें नहीं ।। २९ ।।