महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1942, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंषण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन
जनक उवाच
वर्णो विशेषवर्णानां महर्षे केन जायते ।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तद् ब्रूहि वदतां वर ॥ १ ॥
जनकने पूछा— वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! ब्राह्मण आदि विशेष-विशेष वर्णोंका जो वर्ण है, वह कैसे उत्पन्न होता है? यह मैं जानना चाहता हूँ। आप इस विषयको बतायें ॥ १ ॥
यदेतज्जायतेऽपत्यं स एवायमिति श्रुतिः ।
कथं ब्राह्मणतो जातो विशेषग्रहणं गतः ॥ २ ॥
श्रुति कहती है कि जिससे यह संतान उत्पन्न होती है, तद्रूप ही समझी जाती है अर्थात् संततिके रूपमें जन्मदाता पिता ही नूतन जन्म धारण करता है। ऐसी दशामें प्रारम्भमें ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंसे ही सबका जन्म हुआ है, तब उनकी क्षत्रिय आदि विशेष संज्ञा कैसे हो गयी? ॥ २ ॥
पराशर उवाच
एवमेतन्महाराज येन जातः स एव सः ।
तपसस्त्वपकर्षेण जातिग्रहणतां गतः ॥ ३ ॥
पराशरजीने कहा— महाराज! यह ठीक है कि जिससे जो जन्म लेता है, उसीका वह स्वरूप होता है तथापि तपस्याकी न्यूनताके कारण लोग निकृष्ट जातिको प्राप्त हो गये हैं ॥ ३ ॥
सुक्षेत्राच्च सुबीजाच्च पुण्यो भवति सम्भवः ।
अतोऽन्यतरतो हीनादवरो नाम जायते ॥ ४ ॥
उत्तम क्षेत्र और उत्तम बीजसे जो जन्म होता है, वह पवित्र ही होता है। यदि क्षेत्र और बीजमेंसे एक भी निम्नकोटिका हो तो उससे निम्न संतानकी ही उत्पत्ति होती है ॥ ४ ॥
वक्त्राद् भुजाभ्यामूरुभ्यां पद्भ्यां चैवाथ जज्ञिरे ।
सृजतः प्रजापतेर्लोकानिति धर्मविदो विदुः ॥ ५ ॥
धर्मज्ञ पुरुष यह जानते हैं कि प्रजापति ब्रह्माजी जब मानव-जगत्की सृष्टि करने लगे, उस समय उनके मुख, भुजा, ऊरु और पैर—इन अंगोंसे मनुष्योंका प्रादुर्भाव हुआ था ॥ ५ ॥