भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 197

‘संजय! राजा भगीरथ भी कालके गालमें चले गये, ऐसा हमने सुना है। जिनके विस्तृत यज्ञमें सोम पीकर मदोन्मत्त हुए सुरश्रेष्ठ भगवान् पाकशासन इन्द्रने अपने बाहुबलसे कई सहस्र असुरोंको पराजित किया ।। यः सहस्रं सहस्राणां कन्या हेमविभूषिताः । ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् ।। ६५ ।। ‘जिन्होंने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञमें सोनेके आभूषणोंसे विभूषित दस लाख कन्याओंका दक्षिणारूपमें दान किया था ।। ६५ ।। सर्वा रथगताः कन्या रथाः सर्वे चतुर्युजः । शतं शतं रथे नागाः पद्मिनो हेममालिनः ।। ६६ ।। ‘वे सभी कन्याएँ अलग-अलग रथमें बैठी हुई थीं। प्रत्येक रथमें चार-चार घोड़े जुते हुए थे। हर एक रथके पीछे सोनेकी मालाओंसे विभूषित तथा मस्तकपर कमलके चिह्नोंसे अलंकृत सौ-सौ हाथी थे ।। ६६ ।। सहस्रमश्वा एकैकं हस्तिनं पृष्ठतोऽन्वयुः । गवां सहस्रमश्वेऽश्वे सहस्रं गव्यजाविकम् ।। ६७ ।। ‘प्रत्येक हाथीके पीछे एक-एक हजार घोड़े, हर एक घोड़ेके पीछे हजार-हजार गायें और एक-एक गायके साथ हजार-हजार भेड़-बकरियाँ चल रही थीं ।। ६७ ।। उपह्वरे निवसतो यस्याङ्के निषसाद ह । गङ्गा भागीरथी तस्मादुर्वशी चाभवत् पुरा ।। ६८ ।। ‘तटके निकट निवास करते समय गंगाजी राजा भगीरथकी गोदमें आ बैठी थीं। इसलिये वे पूर्वकालमें भागीरथी और उर्वशी नामसे प्रसिद्ध हुईं ।। ६८ ।। भूरिदक्षिणमिक्ष्वाकुं यजमानं भगीरथम् । त्रिलोकपथगा गङ्गा दुहितृत्वमुपेयुषी ।। ६९ ।। ‘त्रिपथगामिनी गंगाने पुत्रीभावको प्राप्त होकर पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले इक्ष्वाकुवंशी यजमान भगीरथको अपना पिता माना ।। ६९ ।। स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ७० ।। संजय! वे पूर्वोक्त चारों बातोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे अधिक पुण्यात्मा थे, जब वे भी कालसे न बच सके तो दूसरोंके लिये क्या कहा जा सकता है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो ।। दिलीपं च महात्मानं मृतं सृंजय शुश्रुम । यस्य कर्माणि भूरीणि कथयन्ति द्विजातयः ।। ७१ ।। ‘संजय! महामना राजा दिलीप भी मरे थे, यह सुननेमें आया है। उनके महान् कर्मोंका आज भी ब्राह्मणलोग वर्णन करते हैं ।। ७१ ।।