महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1973, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्मसम्मत बोलना यह वाणीकी चौथी विशेषता है (इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठता है) ।। ३८ ।।
साध्या ऊचुः केनायमावृतो लोकः केन वा न प्रकाशते । केन त्यजति मित्राणि केन स्वर्गं न गच्छति ।। ३९ ।।
**साध्योंने पूछा—**हंस! इस जगत्को किसने आवृत कर रखा है? किस कारणसे उसका स्वरूप प्रकाशित नहीं होता है? मनुष्य किस हेतुसे मित्रोंका त्याग करता है? और किस दोषसे वह स्वर्गमें नहीं जाने पाता? ।। ३९ ।।
हंस उवाच अज्ञानेनावृतो लोको मात्सर्यान्न प्रकाशते । लोभात् त्यजति मित्राणि संगात् स्वर्गं न गच्छति ।। ४० ।।
**हंसने कहा—**देवताओ! अज्ञानने इस लोकको आवृत कर रखा है। आपसमें डाह होनेके कारण इसका स्वरूप प्रकाशित नहीं होता। मनुष्य लोभसे मित्रोंका त्याग करता है और आसक्तिदोषके कारण वह स्वर्गमें नहीं जाने पाता ।। ४० ।।
साध्या ऊचुः कः स्विदेको रमते ब्राह्मणानां कः स्विदेको बहुभिर्जोषमास्ते । कः स्विदेको बलवान् दुर्बलोऽपि कः स्वेदेषां कलहं नान्चवैति ।। ४१ ।।
**साध्योंने पूछा—**हंस! ब्राह्मणोंमें कौन एकमात्र सुखका अनुभव करता है? वह कौन ऐसा एक मनुष्य है, जो बहुतोंके साथ रहकर भी चुप रहता है? वह कौन एक मनुष्य है, जो दुर्बल होनेपर भी बलवान् है तथा इनमें कौन ऐसा है, जो किसीके साथ कलह नहीं करता? ।। ४१ ।।
हंस उवाच प्राज्ञ एको रमते ब्राह्मणानां प्राज्ञश्चैको बहुभिर्जोषमास्ते । प्राज्ञ एको बलवान् दुर्बलोऽपि प्राज्ञ एषां कलहं नान्ववैति ।। ४२ ।।
**हंसने कहा—**देवताओ! ब्राह्मणोंमें जो ज्ञानी है, एकमात्र वही परम सुखका अनुभव करता है। ज्ञानी ही बहुतोंके साथ रहकर भी मौन रहता है। एकमात्र ज्ञानी दुर्बल होनेपर भी बलवान् है और इनमें ज्ञानी ही किसीके साथ कलह नहीं करता है ।। ४२ ।।
साध्या ऊचुः