भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1991

सत्पुरुष क्षमासे क्रोधका, संकल्पके त्यागसे कामका, सत्त्वगुणके सेवनसे निद्राका, प्रमादके त्यागसे भयका तथा अल्पाहारके सेवनद्वारा पाँचवें श्वास-दोषका नाश करते हैं ।। ५६-५७ ।।

गुणान् गुणशतैर्ज्ञात्वा दोषान् दोषशतैरपि ।
हेतून् हेतुशतैश्चित्रैश्छित्रान् विज्ञाय तत्त्वतः ।। ५८ ।।
अपां फेनोपमं लोकं विष्णोर्मायाशतैर्वृतम् ।
चित्रभित्तिप्रतीकाशं नलसारमनर्थकम् ।। ५९ ।।
तमः श्वभ्रनिभं दृष्ट्वा वर्षबुद्बुदसंनिभम् ।
नाशप्रायं सुखाद्धीनं नाशोत्तरमिहावशम् ।। ६० ।।
रजस्तमसि सम्मग्नं पङ्के द्विपमिवावशम् ।
सांख्या राजन् महाप्राज्ञास्त्यक्त्वा स्नेहं प्रजाकृतम् ।। ६१ ।।
ज्ञानयोगेन सांख्येन व्यापिना महता नृप ।
राजसानशुभान् गन्धांस्तामसांश्च तथाविधान् ।। ६२ ।।
पुण्यांश्च सात्त्विकान् गन्धान् स्पर्शजान् देहसंश्रितान् ।
छित्त्वाऽऽशु ज्ञानशस्त्रेण तपोदण्डेन भारत ।। ६३ ।।

राजन्! भरतनन्दन! महाबुद्धिमान् सांख्यके विद्वान् सैकड़ों गुणोंके द्वारा गुणोंको, सैकड़ों दोषोंके द्वारा दोषोंको तथा सैकड़ों विचित्र हेतुओंसे विचित्र हेतुओंको तत्त्वतः जानकर व्यापक ज्ञानके प्रभावसे संसारको पानीके फेनके समान नश्वर, विष्णुकी सैकड़ों मायाओंसे ढँका हुआ, दीवारपर बने हुए चित्रके समान, नरकुलके समान सारहीन, अन्धकारसे भरे हुए गड्ढेकी भाँति भयंकर, वर्षाकालके पानीके बुलबुलोंके समान क्षणभंगुर, सुखहीन, पराधीन, नष्टप्राय तथा कीचड़में फँसे हुए हाथीकी तरह रजोगुण और तमोगुणमें मग्न समझते हैं। इसलिये वे संतान आदिकी आसक्तिको दूर करके तपरूप दण्डसे युक्त विवेकरूपी शस्त्रसे राजस-तामस अशुभ गन्धोंको और सुन्दर शोभनीय सात्त्विक गन्धोंको तथा स्पर्शेन्द्रियके देहाश्रित भोगोंकी आसक्तिको शीघ्र ही काट डालते हैं ।। ५८—६३ ।।

ततो दुःखोदकं घोरं चिन्ताशोकमहाह्रदम् ।
व्याधिमृत्युमहाग्राहं महाभयमहोरगम् ।। ६४ ।।
तमःकूर्मं रजोमीनं प्रज्ञया संतरन्त्युत ।
स्नेहपङ्कं जरादुर्गं ज्ञानद्वीपमरिंदम ।। ६५ ।।
कर्मगाधं सत्यतीरं स्थितव्रतमरिंदम ।
हिंसाशीघ्रमहावेगं नानारससमाकरम् ।। ६६ ।।
नानाप्रीतिमहारत्नं दुःखज्वरसमीरणम् ।
शोकत्तृष्णामहावर्तं तीक्ष्णव्याधिमहागजम् ।। ६७ ।।