महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2017, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंछिद्रयुक्त मानता है ।। ५० ।।
अलिङ्गो लिङ्गमात्मानमकालः कालमात्मनः ।
असत्त्वं सत्त्वमात्मानमतत्त्वं तत्त्वमात्मनः ।। ५१ ।।
वह लिंग (सूक्ष्म) शरीरसे हीन होनेपर भी अपनेको उससे युक्त मानता है। कालधर्म (मृत्यु) से रहित होकर भी अपनेको कालधर्मी (मरणशील) समझता है। सत्त्वसे भिन्न होकर भी अपनेको सत्त्वरूप मानता है तथा महाभूतादि तत्त्वसे रहित होकर भी अपने आपको तत्त्वस्वरूप समझता है ।। ५१ ।।
अमृत्युर्मृत्युमात्मानमचरश्चरमात्मनः ।
अक्षेत्रः क्षेत्रमात्मानमसर्गः सर्गमात्मनः ।। ५२ ।।
वह मृत्युसे सर्वथा रहित है तो भी अपनेको मृत्युग्रस्त मानता है। अचर होनेपर भी अपनेको चलने-फिरनेवाला मानता है। क्षेत्रसे भिन्न होनेपर भी अपनेको क्षेत्र मानता है। सृष्टिसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं होनेपर भी सृष्टिको अपनी ही समझता है ।। ५२ ।।
अतपास्तप आत्मानमगत्तिर्गतिमात्मनः ।
अभवो भवमात्मानमभयो भयमात्मनः ।। ५३ ।।
अक्षरः क्षरमात्मानमबुद्धिस्त्वभिमन्यते ।। ५४ ।।
वह कभी तप नहीं करता तो भी अपनेको तपस्वी मानता है। कहीं गमन नहीं करता तो भी अपनेको आने-जानेवाला समझता है। संसाररहित होकर भी अपनेको संसारी और निर्भय होकर भी अपनेको भयभीत मानता है। यद्यपि वह अक्षर (अविनाशी) है तो भी अपनेको क्षर (नाशवान्) समझता है तथा बुद्धिसे परे होनेपर भी बुद्धिमत्ताका अभिमान रखता है ।। ५३-५४ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वसिष्ठकरालजनकसंवादे
त्र्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३०३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वसिष्ठ और करालजनकका संवादविषयक तीन सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३०३ ।।
* किसी-किसी टीकाकारने ‘सिध्मा’ का अर्थ ‘खाँसी’ और ‘दमा’ भी किया है। परंतु कोष-प्रसिद्ध अर्थ ‘सफेद दाग या सेहुँवा’ ही है।