भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2024

केवलं त्वभिमानित्वाद् गुणेषु गुण उच्यते ॥ २८ ॥ आत्मा तो जन्म-मृत्युसे रहित, अनन्त, सबका द्रष्टा और निर्विकार है। वह सत्त्व आदि गुणोंमें केवल अभिमान करनेके कारण ही गुणस्वरूप कहलाता है॥ गुणा गुणवतः सन्ति निर्गुणस्य कुतो गुणाः । तस्मादेवं विजानन्ति ये जना गुणदर्शिनः ॥ २९ ॥ यदा त्वेष गुणानेतान् प्राकृतानभिमन्यते । तदा स गुणहान्यै तं परमेवानुपश्यति ॥ ३० ॥ गुण तो गुणवान्‌में ही रहते हैं। निर्गुण आत्मामें गुण कैसे रह सकते हैं। अतः गुणोंके स्वरूपको जाननेवाले विद्वान् पुरुषोंका यही सिद्धान्त है कि जब जीवात्मा इन गुणोंको प्रकृतिका कार्य मानकर उनमें अपनेपनका अभिमान त्याग देता है, उस समय वह देह आदिमें आत्मबुद्धिका परित्याग करके अपने विशुद्ध परमात्म-स्वरूपका साक्षात्कार करता है ॥ २९-३० ॥ यत् तद् बुद्धेः परं प्राहुः सांख्या योगाश्च सर्वशः । बुद्ध्यमानं महाप्राज्ञमबुद्धपरिवर्जनात् ॥ ३१ ॥ अप्रबुद्धमथाव्यक्तं सगुणं प्राहुरीश्वरम् । निर्गुणं चेश्वरं नित्यमधिष्ठातारमेव च ॥ ३२ ॥ प्रकृतेश्च गुणानां च पञ्चविंशतिकं बुधाः । सांख्ययोगे च कुशला बुध्यन्ते परमैषिणः ॥ ३३ ॥ सांख्य और योगके सम्पूर्ण विद्वान् जिसको बुद्धिसे परे बताते हैं, जो परम ज्ञानसम्पन्न है, अहंकार आदि जड तत्त्वोंका परित्याग (बाध) कर देनेपर शेष रहे हुए चिन्मय तत्त्वके रूपमें जिसका बोध होता है, जो अज्ञात, अव्यक्त, सगुण ईश्वर, निर्गुण ईश्वर, नित्य और अधिष्ठाता कहा गया है, वह परमात्मा ही प्रकृति और उसके गुणों (चौबीस तत्त्वों) की अपेक्षा पचीसवाँ तत्त्व है, ऐसा सांख्य और योगमें कुशल तथा परमतत्त्वकी खोज करनेवाले विद्वान् पुरुष समझते हैं ॥ ३१—३३ ॥ यदा प्रबुद्धा ह्यव्यक्तमवस्थाजन्मभीरवः । बुध्यमानं प्रबुध्यन्ति गमयन्ति समं तदा ॥ ३४ ॥ जिस समय बाल्य, यौवन और वृद्धावस्था अथवा जन्म-मरणसे भयभीत हुए विवेकी पुरुष चेतन-स्वरूप अव्यक्त परमात्माके तत्त्वको ठीक-ठीक समझ लेते हैं, उस समय उन्हें परब्रह्म परमात्माके स्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ३४ ॥ एतन्निदर्शनं सम्यगसम्यगनिदर्शनम् । बुध्यमानाप्रबुद्धानां पृथक्पृथगरिंदम ॥ ३५ ॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! ज्ञानी पुरुषोंका यह ज्ञान युक्तियुक्त होनेके कारण उत्तम और (अज्ञानियोंकी धारणासे) पृथक् है। इसके विपरीत अज्ञानी पुरुषोंका जो