महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषडधिकत्रिशततमोऽध्यायः
योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति
जनक उवाच
नानात्वैकत्वमित्युक्तं त्वयैतदृषिसत्तम ।
पश्याम्येतद्धि संदिग्धमेतयोर्वै निदर्शनम् ॥ १ ॥
जनकने पूछा—मुनिश्रेष्ठ! आपने क्षरको अनेक रूप और अक्षरको एकरूप बताया; किंतु इन दोनोंके तत्त्वका जो निर्णय किया गया है, उसे मैं अब भी संदेहकी दृष्टिसे ही देखता हूँ ॥ १ ॥
तथा बुद्धप्रबुद्धाभ्यां बुद्ध्यमानस्य चानघ ।
स्थूलबुद्ध्या न पश्यामि तत्त्वमेतन्न संशयः ॥ २ ॥
निष्पाप महर्षे! जिसे अज्ञानी पुरुष (अनेक रूपमें) और ज्ञानी पुरुष एक रूपमें जानते हैं, उस परमात्माका तत्त्व मैं अपनी स्थूल बुद्धिके कारण समझ नहीं पाता हूँ। मेरे इस कथनमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ २ ॥
अक्षरक्षरयोरुक्तं त्वया यदपि कारणम् ।
तदप्यस्थिरबुद्धित्वात् प्रणष्टमिव मेऽनघ ॥ ३ ॥
अनघ! यद्यपि आपने क्षर और अक्षरको समझानेके लिये अनेक प्रकारकी युक्तियाँ बतायी हैं तथापि मेरी बुद्धि अस्थिर होनेके कारण मैं उन सारी युक्तियोंको मानो भूल गया हूँ ॥ ३ ॥
तदेतच्छ्रोतुमिच्छामि नानात्वैकत्वदर्शनम् ।
बुद्धं चाप्रतिबुद्धं च बुध्यमानं च तत्त्वतः ॥ ४ ॥
इसलिये इस नानात्व और एकत्व-रूप दर्शनको मैं पुनः सुनना चाहता हूँ। बुद्ध (ज्ञानवान्) क्या है? अप्रतिबुद्ध (ज्ञानहीन) क्या है? तथा बुद्ध्यमान (ज्ञेय) क्या है? यह ठीक-ठीक बताइये ॥ ४ ॥
विद्याविद्ये च भगवन्नक्षरं क्षरमेव च ।
साङ्ख्यं योगं च कार्त्स्न्येन पृथक् चैवापृथक् च ह ॥ ५ ॥
भगवन्! मैं विद्या, अविद्या, अक्षर और क्षर तथा सांख्य और योगको पृथक्-पृथक् पूर्णरूपसे समझना चाहता हूँ ॥ ५ ॥
वसिष्ठ उवाच