महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2032, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइतना ही सांख्यदर्शन है। सांख्यके विद्वान् तत्त्वोंकी संख्या (गणना) करते और प्रकृतिको ही जगत्का कारण बताते हैं। इसीलिये इस दर्शनका नाम सांख्यदर्शन है ।। तत्त्वानि च चतुर्विंशत् परिसंख्याय तत्त्वतः। सांख्याः सह प्रकृत्या तु निस्तत्त्वः पञ्चविंशकः॥ ४३॥ सांख्यवेत्ता पुरुष प्रकृतिसहित चौबीस तत्त्वोंकी परिगणना करके परमपुरुषको जड तत्त्वोंसे भिन्न पचीसवाँ निश्चित करते हैं।। ४३ ।। पञ्चविंशोऽप्रकृत्यात्मा बुध्यमान इति स्मृतः। यदा तु बुध्यतेऽऽत्मानं तदा भवति केवलः॥ ४४॥ वह पचीसवाँ प्रकृतिरूप नहीं है। उससे सर्वथा भिन्न ज्ञानस्वरूप माना गया है। जब वह अपने-आपको प्रकृतिसे भिन्न नित्यचिन्मय जान लेता है, उस समय केवल हो जाता है अर्थात् अपने विशुद्ध परब्रह्मरूपमें स्थित हो जाता है ।। ४४ ।। सम्यग्दर्शनमेतावद् भाषितं तव तत्त्वतः। एवमेतद् विजानन्तः साम्यतां प्रति यान्त्युत॥ ४५॥ इस प्रकार मैंने तुमसे यह सम्यग्दर्शन (सांख्य) का यथावत्रूपसे वर्णन किया है। जो इसे इस प्रकार जानते हैं, वे शान्तस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ।। ४५ ।। सम्यङ्निदर्शनं नाम प्रत्यक्षं प्रकृतेस्तथा। गुणतत्त्वान्यथैतानि निर्गुणोऽन्यस्तथा भवेत्॥ ४६॥ प्रकृति-पुरुषका प्रत्यक्ष-दर्शन (अपरोक्ष-अनुभव) ही सम्यग्दर्शन है। ये जो गुणमय तत्त्व हैं, इनसे भिन्न परमपुरुष परमात्मा निर्गुण हैं ।। ४६ ।। न त्वेवं वर्तमानानामावृत्तिर्विद्यते पुनः। विद्यतेऽक्षरभावत्वादपरं परमव्ययम्॥ ४७॥ इस दर्शनके अनुसार ज्ञान प्राप्त करनेवालोंकी इस संसारमें पुनरावृत्ति नहीं होती; क्योंकि वे अविनाशी ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाते हैं, अतः परापरस्वरूप निर्विकार परब्रह्मरूपसे ही उनकी स्थिति होती है ।। ४७ ।। पश्येरन्नैकमतयो न सम्यक् तेषु दर्शनम्। ते व्यक्तं प्रतिपद्यन्ते पुनः पुनररिंदम॥ ४८॥ शत्रुदमन नरेश! जिनकी बुद्धि नानात्वका दर्शन करती है, उन्हें सम्यक्-ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती। ऐसे लोगोंको बारंबार शरीर धारण करना पड़ता है ।। ४८ ।। सर्वमेतद् विजानन्तो नासर्वस्य प्रबोधनात्। व्यक्तीभूता भविष्यन्ति व्यक्तस्य वशवर्तिनः॥ ४९॥ जो इस सारे प्रपंचको ही जानते हैं, वे इससे भिन्न परमात्माका तत्त्व न जाननेके कारण निश्चय ही शरीरधारी होंगे और शरीर तथा काम-क्रोध आदि दोषोंके वशवर्ती बने रहेंगे ।। ४९ ।।