महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2038, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'इसीमें मुझे अपनी समानता दिखायी देती है। मैं अवश्य इसके ही सदृश हूँ। यह परमात्मा प्रत्यक्ष ही अत्यन्त निर्मल है और मैं भी ऐसा ही हूँ॥ २८ ॥
योऽहमज्ञानसम्मोहाज्जज्ञया सम्प्रवृत्तवान्।
ससङ्गयाहं निःसङ्गः स्थितः कालमिमं त्वहम् ॥ २९ ॥
'मैं जो कि आसक्तिसे सर्वथा रहित हूँ तो भी अज्ञान एवं मोहके वशीभूत होकर इतने समयतक इस आसक्तिमयी जड प्रकृतिके साथ रमता रहा ॥ २९ ॥
अनयाहं वशीभूतः कालमेतं न बुद्धवान्।
उच्चमध्यमनीचानां तामहं कथमावसे ॥ ३० ॥
'इसने मुझे इस तरह वशमें कर लिया था कि मुझे आजतकके समयका पता ही न चला। यह तो उच्च, मध्यम तथा नीच सब श्रेणीके लोगोंके साथ रहती है। भला, इसके साथ मैं कैसे रह सकता हूँ? ॥ ३० ॥
समानयानया चेह सह वासमहं कथम्।
गच्छाम्यबुद्धभावत्वादेषेदानीं स्थिरो भवे ॥ ३१ ॥
'जो मेरे साथ संयुक्त होकर मेरी समानता करने लगी है, ऐसी इस प्रकृतिके साथ मैं मूर्खतावश सहवास कैसे कर सकता हूँ? यह लो, अब मैं स्थिर हो रहा हूँ॥
सहवासं न यास्यामि कालमेतद्धि वञ्चनात्।
वञ्चितोऽस्म्यनया यद्धि निर्विकारो विकारया ॥ ३२ ॥
'मैं निर्विकार होकर भी इस विकारमयी प्रकृतिके द्वारा ठगा गया। इतने समयतक इसने मेरे साथ ठगी की है। इसलिये अब इसके साथ नहीं रहूँगा ॥ ३२ ॥
न चायमपराधोऽस्या ह्यपराधो ह्ययं मम।
योऽहमत्राभवं सक्तः पराङ्मुखमुपस्थितः ॥ ३३ ॥
'किंतु यह इसका अपराध नहीं है, सारा अपराध मेरा ही है; जो कि मैं परमात्मासे विमुख होकर इसमें आसक्त हुआ स्थित रहा ॥ ३३ ॥
ततोऽस्मि बहुरूपासु स्थितो मूर्तिष्वमूर्तिमान्।
अमूर्त्तश्चापि मूर्तात्मा ममत्वेन प्रधर्षितः ॥ ३४ ॥
'यद्यपि मैं सर्वथा अमूर्त हूँ अर्थात् किसी आकार-वाला नहीं हूँ तो भी मैं प्रकृतिकी अनेक रूपवाली मूर्तियोंमें स्थित हुआ देहरहित होकर भी ममतासे परास्त होनेके कारण देहधारी बना रहा ॥ ३४ ॥
प्राक् कृतेन ममत्वेन तासु तास्विह योनिषु।
निर्ममस्य ममत्वेन किं कृतं तासु तासु च ॥ ३५ ॥
'पहले जो मैंने इसके प्रति ममता की थी, उसके कारण मुझे भिन्न-भिन्न योनियोंमें भटकना पड़ा। यद्यपि मैं ममतारहित हूँ तो भी इस प्रकृतिजनित ममताने भिन्न-भिन्न योनियोंमें मुझे डालकर मेरी बड़ी दुर्दशा कर डाली ॥