भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2042, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2042

सांगात्मक (संगी) होता है; ऐसा श्रुतिका कथन है। इस संगदोषके कारण ही अव्यक्त एवं अविकारी जीवात्माको लोग 'मूढ़' कह दिया करते हैं।। ५ ।। अव्यक्तबोधनाच्चापि बुध्यमानं वदन्त्युत । पञ्चविंशं महात्मानं न चासावपि बुध्यते ।। ६ ।। षड्विंशं विमलं बुद्धमप्रमेयं सनातनम् । स तु तं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं च बुध्यते ।। ७ ।। पचीसवाँ तत्त्वरूप महान् आत्मा अव्यक्त प्रकृतिको जानता है, इसलिये उसे 'बुध्यमान' कहते हैं; परंतु वह भी छब्बीसवें तत्त्वरूप निर्मल नित्य शुद्ध बुद्ध अप्रमेय सनातन परमात्माको नहीं जानता है; किंतु वह सनातन परमात्मा उस पचीसवें तत्त्वरूप जीवात्माको तथा चौबीसवीं प्रकृतिको भी भलीभाँति जानता है ।। ६-७ ।। दृश्यादृश्ये ह्यनुगतं स्वभावेन महाद्युते । अव्यक्तमत्र तद् ब्रह्म बुध्यते तात केवलम् ।। ८ ।। तात! महातेजस्वी नरेश! वह अव्यक्त एवं अद्वितीय ब्रह्म यहाँ दृश्य और अदृश्य सभी वस्तुओंमें स्वभावसे ही व्याप्त है; अतः वह सबको जानता है ।। ८ ।। केवलं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं न पश्यति । बुध्यमानो यदाऽऽत्मानमन्योऽहमिति मन्यते ।। ९ ।। तदा प्रकृतिमानेष भवत्यव्यक्तलोचनः । चौबीसवीं अव्यक्त प्रकृति न तो अद्वितीय ब्रह्मको देख पाती है और न पचीसवें तत्त्वरूप जीवात्माको। जब जीवात्मा अव्यक्त ब्रह्मकी ओर दृष्टि रखकर अपनेको प्रकृतिसे भिन्न मानता है, तब यह प्रकृतिका अधिपति हो जाता है ।। ९ १/२ ।। बुध्यते च परां बुद्धिं विशुद्धाममलां यदा ।। १० ।। षड्विंशो राजशार्दूल तथा बुद्धत्वमाव्रजेत् । ततस्त्यजति सोऽव्यक्तं सर्गप्रलयधर्मि वै ।। ११ ।। नृपश्रेष्ठ! जब जीवात्मा शुद्ध ब्रह्मविषयिणी, निर्मल एवं सर्वोत्कृष्ट बुद्धिको प्राप्त कर लेता है, तब वह छब्बीसवें तत्त्वरूप परब्रह्मका साक्षात्कार करके तद्रूप हो जाता है। उस स्थितिमें वह नित्य शुद्ध-बुद्ध ब्रह्मभावमें ही प्रतिष्ठित होता है। फिर तो वह सृष्टि और प्रलयरूप धर्मवाली अव्यक्त प्रकृतिसे सर्वथा अतीत हो जाता है ।। १०-११ ।। निर्गुणः प्रकृतिं वेद गुणयुक्तामचेतनाम् । ततः केवलधर्मासौ भवत्यव्यक्तदर्शनात् ।। १२ ।। वह गुणोंसे अतीत होकर त्रिगुणमयी प्रकृतिको जडरूपमें जान लेता है, इस प्रकार प्रकृतिको अपनेसे सर्वथा अभिन्न देखनेके कारण वह कैवल्यको प्राप्त हो जाता है ।। १२ ।। केवलेन समागम्य विमुक्तोऽऽत्मानमाप्नुयात् ।